करणी माता देशनोक की पूरी जानकारी Karni Mata Deshnok

हेलो दोस्तों आज हम राजस्थान के बीकानेर जिले में करणी माता जी का मंदिर देशनोक और माता जी के जीवन के बारे में जानेगे 

करणी माता का जीवन परिचय देशनोक (बीकानेर) Karni Mata Biography In hindi

  • श्री करणी माँ का जन्म – विक्रम संवत् 1444 की आसोज सुदी के सप्तमी को सुवाप में हुआ था
  • जन्म का नाम  – रिद्धि बाई
  • पिता – मेहाजी
  • माता – देवल बाई
  • ग्राम – सुवाप
  • वंश – चारण वंश
करणी माता का जन्म सप्तमी को सुवाप नामक ग्राम में चारण वंश के ‘मेहाजी’ (पिता) तथा ‘देवल बाई’ (माता) के घर हुआ ! ध्यातव्य रहे- करणी माता को चूहे की देवी और उनके मंदिर को चूहों का मंदिर कहते हैं ! तो करणी माता बीकानेर के राठौड़ों की इष्ट देवी तथा चारणों की कुल देवी है ! इनका जन्म का नाम ‘रिद्धि बाई’ रखा गया !
किंतु अपने भाई के पाँच पुत्रियों के बाद एक ओर पुत्री के जन्म पर इनकी बुआ ने इनके सिर पर तिरस्कार पूर्वक हाथ रखा तो ! बुआ की जुड़ी हुईं अंगुलियाँ ठीक हो गई ! तो इनकी बुआ ने इन्हें होनहार बालिका के रूप में स्वीकार कर इनका नाम करणी रखा ! छह वर्ष की आयु में पिता का सर्प-विष उतारकर जीवन-दान दिया ! पूगल के राव शेखा को युद्ध में विजय दिलवाई  ! गौधन का हरण करने वाले राव कान्हा का इन्होंने वध किया था !
 इनकी इष्ट देवी तेमड़ाजी  थीं करणी माता को आवड़ माता/जगत माता का अवतार कहा जाता है !

श्रीकरणी माता का विवाह Karni Mata Deshnok Bikaner –

करणी माता का विवाह साठीका गाँव के चारण बीठू केलु के बेटे देपाजी बीठू से हुआ ! परंतु भोग-विलास से विरक्त होते हुए उन्होंने ! पति को समझाया और अपने पति का विवाह अपनी दूसरी बहिन गुलाब कुँवरी से करवाकर स्वयं ! देशनोक के पास जाँगळू के बीड़/नेहड़ी ‘नेहड़ी उस खेजड़ी का नाम है ! जहाँ बैठकर करणी माता विलोवणा/दही मंथन’ किया करती थीं ! नामक स्थान पर रहने लगीं ! इसके बाद इन्होंने देशनोक को अपना कार्यस्थल बनाया श्रीकरणी माता ने देशनोक की स्थापना स्वयं ने की थी !
  • श्रीकरणी माता के गोद लिए पुत्र को पुनर्जिवित कर दिया Karni Mata hindi –

पौराणिक कथा के अनुसार करणी माता ने अपनी बहन गुलाब कुँवरी के पुत्र लाखण जी को गोद लिया था ! लेकिन उसकी मृत्यु हो गई इस पर श्रीकरणी माता ने उस को अपने बल से पुनर्जिवित कर दिया ! इस पर देवलोक के यमराज ने कहा कि यह प्रकृति के विरुद्ध है ! आप पुनः इस बच्चे को मृत करें लेकिन माता करणी ने मना कर दिया ! इस पर यमराज ने कहा कि अगर आपने ऐसा नहीं किया तो भविष्य में आपके किसी भी वंशज को यमलोक में नहीं आने दूंगा !
  • श्रीकरणी माता के सभी वंशज मंदिर में चूहे बनकर रहते है –

इस पर करणीजी ने कहा कि मेरे सभी वंशज आज के बाद मेरे मंदिर में चूहे बनकर रहेंगे ! इस प्रकार यहाँ पर पाये जाने वाले चूहे इन्हीं के वंशज कहलाते हैं ! यहाँ माता के आशिर्वाद के कारण ही इतने अधिक चूहे होने के बाद भी प्लेग नहीं फैलता ! सभी चूहे काले रंग के होते हैं ! चूहों में सफ़ेद रंग के चूहे का दर्शन अतिशुभ माना जाता है ! यह सफ़ेद चूहे करणी माता के काबे कहलाते हैं ! और माताजी का मंदिर मठ कहा जाता है ! कहा जाता है कि श्रीकरणी माता का एक रूप सफेद चील भी है !

करणी माता का मंदिर देशनोक Karni Mata Tample Deshnok –

करणी माता का मंदिर देशनोक (बीकानेर) में है जिसका प्रवेश द्वार (सिंह द्वार) संगमरमर से बनाया गया है ! यह शुभ कार्य बीकानेर के सेठ चाँदमल ढढा ने करवाया था ! इस श्रीकरणी माता जी के मंदिर के किंवाड़ सोने के बने हैं ! जो अलवर के महाराजा बख्तावर सिंह जी ने बनवाये थे ! यहाँ प्रतिवर्ष दो बार चैत्र और आश्विन के नवरात्रों में मेलों का आयोजन किया जाता है ! और श्रीकरणी माता ने जोधपुर के मेहरानगढ़ दुर्ग की नींव स्वयं अपने हाथ से रखी थी !
साथ ही राव जोधा के पुत्र राव बीका के बीकानेर राज्य की स्थापना भी श्रीकरणी माता के आशिर्वाद से ही हुई थी ! माता करणी जी बीकानेर राज्य वंश की इष्ट देवी और चारणों की कुल देवी है ! और करणी माताजी ने लगभग 150 वर्ष तक इस भौतिक शरीर को धारण किये रखने के उपरान्त ! विक्रम संवत् 1595 के चैत्र शुक्ला नवमी को घिनेरू की तलाई नाम के स्थान पर ही श्रीकरणी माता ने अपने प्राण त्याग दिए !

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