गागरोन दुर्ग की पूरी जानकारी Gagron Fort

हेलो दोस्तों आज हम राजस्थान के झालावाड़ से 10 कि.मी. की दूरी पर स्थित गागरोन दुर्ग के इतिहास के बारे में जानेगे 

गागरोन दुर्ग का परिचय Gagron Fort Introduction In Hindi

गागरोन दुर्ग दक्षिण और पूर्वी राजस्थान के सबसे पुरानी और विकट दुर्गों में से एक प्रमुख जल दुर्ग माना जाता है  ! इस दुर्ग का निर्माण आह और कालीसिंध नदी के संगम (इस संगम को  हमारी बोलचाल की भाषा में ‘सामेलजी’ कहा जाता है ) ! पर स्थित मुकंदर नामक पहाड़ी पर 7-8वीं शताब्दी में डोर राजपूत (परमार) राजा बीजलदेव द्वारा करवाया गया ! डोडराजपूतों के नाम पर यह ‘डोडगढ़ धूलरगढ़’ कहलाने लगा !

  • पूरा नाम  गागरोन दुर्ग या गागरोन किला (Gagron Fort)
  • निर्माता का नाम  – राजपूत (परमार) राजा बीजलदेव द्वारा करवाया गया
  • निर्माण कब हुआ –  7-8वीं शताब्दी में
  • पहाड़ी का नाम  –  मुकंदर नामक पहाड़ी पर बना हुआ है
  • स्थान  – झालावाड़ से लगभग 10 कि.मी. की दूरी पर स्थित है ! (राज्य – राजस्थान , भारत )

गागरोन दुर्ग का इतिहास History of Gagron Fort In Hindi

12 वीं शताब्दी में  गागरोन दुर्ग के खींची राजवंश के संस्थापक देवनसिंह (उर्फ धारू) ने बीजलदेव को हराकर ! धूलरगढ़ पर अधिकार कर उसका नाम गागरोण रखा ! इतिहास के अनुसार यह कृष्ण के पुरोहित गर्गाचारी ऋषि की साधना स्थली थी ! और इसका पुराना नाम इसी ऋषि के नाम पर गर्गराटपुर/गलका नगरी था ! यह दुर्ग जल दुर्ग(उदक दुर्ग) की  श्रेणी में आता है ! पुरे भारत देश में मात्र यही एक दुर्ग है जो बिना नींव के एक कठोर चट्टान पर बना हुआ है !  यहाँ का 100 वर्षीय पंचाग राष्ट्रभर में प्रसिद्ध था ! इस किले में एक टकसाल थी ! जहाँ बादशाह शाहआलम के समय चाँदी का सालिम शाही रुपया ढ़ाला जाता था !  गागरोण दुर्ग अरावली पर्वतमाला पर अवस्थित नहीं है यह दुर्ग विध्यांचल पर्वत श्रेणी पर अवस्थित है !

दुर्ग में रचित ग्रंथ

गागरोन दुर्ग में अचलदास खींची री वचनिका इसकी रचना शिवदास गाडण ने डिंगल भाषा में अचलदास खींची के शासनकाल में सन् 1423 ई. में किया ! वेलिक्रिसन रूक्मणी री वचनिका इसकी रचना पृथ्वीराज राठौड़ (बीकानेर के कल्याणमल का पुत्र व रायसिंह राठौड़ का भाई) ने डिंगल भाषा में मुगल बादशाह अकबर के शासनकाल में लगभग सन् 1577 ई. में किया ! और इस ग्रंथ में दो पात्र थे पीथल (वह स्वयं) तथा पाथल (महाराणा प्रताप) वैसे पीथल-पाथल ग्रंथ की रचना कन्हैया लाल सेठिया ने की ! इस वेलिक्रिसन रुक्मणीरी नामक ग्रंथ को कर्नल जेम्स टॉड ने पढ़ा और कहा की शायद प्रताप ने अकबर की अधीनता स्वीकार की ! दुरसा हाडा ने पढ़कर इसे पाँचवाँ वेद तथा 19वाँ पुराण की संज्ञा दी !

दुर्ग में दर्शनीय स्थल places to visit in Gagron Fort In Hindi

  • मिठे साहब की दरगाह – Sweet Saheb’s Dargah in Gagron Fort

1303 ई. में जैतसिंह व अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में खुरासन से प्रसिद्ध सूफी संत हमीदुद्दीन चिश्ती गागरोन आए ! और उनकी वफात (मृत्यु) वहीं पर हो गई !और उनकी समाधि पर औरंगजेब द्वारा निर्मित ऐतिहासिक दरगाह गागरोन दुर्ग में स्थित है !

  • संत पीपा की छतरी –

इनके बचपन का नाम प्रतापसिंह (दिल्ली के सुल्तान फिरोजशाह तुगलक के समकालीन) था ! जिनका जन्म 1425 ई. में गागरोन के राजा कडावा राव व रानी लक्ष्मीपति के घर हुआ ! वे संत रामानंद काशिष्यत्व स्वीकार कर राजस्थान में भक्ति आंदोलन का अलख जगाने वाले ये प्रथम संत थे ! पीपा जी अपने ऑतम समय में टोंक जिले के ‘टोडा ग्राम’ की एक गुफा में भजन किया करते थे ! जो आज भी पीपाजी की गुफा’ के नाम से जानी जाती है ! संत पीपा की छतरी  गागरोन दुर्ग में कालीसिंध और आहू नदियों के संगम पर है !

  • बुलंद दरवाजा –

इसका निर्माण औरंगजेब ने करवाया ! गीध कराई  गागरोन दुर्ग के पीछे कालीसिंध के तट पर एक ऊंची पहाड़ी को गीध कराई कहते हैं ! पुराने समय में जब किसी राजनैतिक बंदी को मृत्यु देना होता था तब उसे इस पहाड़ी पर से नीचे गिरा दिया जाता था !

  • गागरोनी तोता –

तोते की यह प्रजाति हूबहू इंसान की तरह बोलती हैं कहा जाता है की चित्तौड़ की रानी पद्मिनी के पास जोहीरामन तोता था ! वह इसी प्रजाति का था ! विख्यात पक्षी विज्ञानी सलीम अली ने अपनी पुस्तक ‘द बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स’ में इन तोतों को हीरामन जाति का लिखा है !

  • जालिमकोट –

कोटा रियासत के सेनापति जालिम सिंह झाला ने गागरोन के किले को आक्रांताओं से बचाने के लिए एक विशाल परकोटे का निर्माण करवाया ! जो उन्हीं के नाम पर जालिम कोट कहलाता है !  गागरोन दुर्ग में पत्थर वर्षा यंत्र, नक्कारखाना, प्राचीन लकड़ी का उठाऊ पुल आदि स्थित हैं !

गागरोन दुर्ग के साके Sake of Gagron Fort In Hindi

दुर्ग पहला साका सन् 1423 ई. में हुआ ! जब मांडू (मालवा) के सुल्तान अलपखा गौरी (उर्फ होशंगशाह) ने गागरोण दुर्ग पर आक्रमण कर दिया ! शिवदास गाडण ने अपने द्वारा रचित काव्यकृति ‘अचलदास खींची री वचनिका’ में इस युद्ध का सजीव चित्रण करते हुए ! लिखा है कि महाष्टमी से दूसरी अष्टमी तक अर्थात् 13 सितम्बर, 1423 ई. से 27 सितम्बर, 1423 ई. तक यह युद्ध चला ! अचलदास (मेवाड़ के राणा मोकल का दामाद व भोज का पुत्र) ने अपने वंश की रक्षा के लिए !

अपने ज्येष्ठ पुत्र पाल्हणसी (लाला मेवाड़ी मोकल की पुत्री व कुंभा की बहन की गोद से उत्पन्न था) को दुर्ग से पलायन करने हेतु प्रेरित कर बाहर निकाला ! बाद में भीषण संग्राम हुआ जिसमें अचलदास खिंची के नेतृत्व में योद्धाओं ने केसरिया किया ! और पटरानी लाला मेवाड़ी (उमादे) के नेतृत्व में दुर्ग की ललनाओं ने जौहर किया !

 गागरोन दुर्ग का दूसरा साका Second Saka of Gagron Fort In Hindi

गागरोन दुर्ग का दूसरा साका सन् 1444 ई. में हुआ जब मांडू (मालवा) के सुल्तान महमूद खिलजी प्रथम ने गागरोण दुर्ग पर आक्रमण किया ! तब पाल्हणसी व महमूद के मध्य युद्ध हुआ जब पाल्हणसी को कोई जीत की आस न रही तो उसके नेतृत्व में योद्धाओं ने केसरिया किया ! तथा रानियों ने जौहर किया !  महमूद खिलजी प्रथम ने  गागरोन दुर्ग जीतकर उसका नाम ‘मुस्तफाबाद’ कर दिया !


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