जयपुर के मंदिर Jaipur Temples

राजस्थान के जयपुर के मंदिर जिसके दर्सन मात्र से ही भग्तो के मन को एक सुकून मिलता है ! जयपुर जिले में ऐसे तो अनेक भव्य मंदिर स्थित है उनमे से महत्वपूर्ण मंदिरो की पूरी जानकारी बतायेंगे Temples of Jaipur

राजस्थान के जयपुर के मंदिर Temples of Jaipur, Rajasthan in hindi

  • जयपुर के मंदिरो की सुची –
  1. गोविन्ददेव जी मंदिर, जयपुर
  2. शिलामाता का मंदिर, जयपुर
  3. शिलादेवी संग विराजमान हिंगलाज माता जयपुर
  4. विश्व का एकमात्र कल्की मंदिर जयपुर
  5. जगत् शिरोमणि मंदिर जयपुर
  6. नृसिंह मंदिर जयपुर
  7. संघी झंथाराम का मंदिर जयपुर
  8. लाड़ली जी का मंदिर जयपुर
  9. चरण मंदिर जयपुर
  10. अन्य 56 मंदिर जयपुर    —–  अधिक जानकारी  

गोविन्ददेव जी मंदिर, जयपुर Govinddev Ji Mandir, Jaipur –

जयपुर के मंदिर भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र एवं मथुरा के राजा वज्रनाभ ने अपनी माता से सुने गए भगवान श्री कृष्ण के स्वरूप के आधार पर तीन विग्रहों का निर्माण करवाया !

इनमें से  पहला विग्रह गोविंद देवजी का है,

दूसरा विग्रह जयपुर के ही श्री गोपीनाथजी का है 

तीसरा विग्रह श्री मदनमोहनजी (करौली) का है !

वज्रनाभ की माता के अनुसार श्री गोविंददेव का मुख, श्री गोपीनाथ का वक्ष तथा श्री मदन मोहन के चरण श्री कृष्ण के स्वरूप से मेल खाते हैं !
पहले ये तीनों विग्रह मथुरा में स्थापित थे ! किंतु ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के प्रारम्भ में महमूद गजनवी के आक्रमणों के भय से इन्हें जंगल में छिपा दिया गया ! सोलहवीं शताब्दी ई. में चैतन्य महाप्रभु के आदेश पर उनके शिष्यों ने इन विग्रहों को खोज निकाला ! और मथुरा-वृंदावन में स्थापित कर दिया ! सन् 1669 में जब औरंगजेब ने मथुरा मंदिरों को नष्ट करने का आदेश दिया तो गौड़ीय संप्रदाय के पुजारी इन विग्रहों को उठाकर जयपुर भाग आये !

इन तीनों विग्रहों को जयपुर में ही स्थापित कर दिया गया ! गोविंद देवजी को जयपुर का शासक माना गया और वहाँ शासकीय मर्यादाएं लागू हुई ! बाद में मदनमोहनजी को करौली के राजा ने जयपुर के राजा से मांग लिया और उन्हें करौली ले गये जहाँ वे आज भी विराजमान हैं ! 1739 ई. से गोविन्ददेव जी वर्तमान जयपुर के मंदिर में प्रतिष्ठित एवं पूजित है !

  •  महाराजा जयसिंह द्वितीय

महाराजा जयसिंह द्वितीय ने भगवान की इत्र सेवा के लिए सखी विशाखा का श्री विग्रह भेंट किया ! जो श्री राधा गोविन्ददेव जी के बायीं
ओर स्थापित की गयी ! 1809 ई. में सवाई प्रतापसिंह जी ने सखी ललिता का श्री विग्रह ठाकुर जी की पान सेवा के लिए भेंट किया ! जिनको ठाकुर जी के दाहिनी ओर स्थापित किया गया ! यह जयपुर के मंदिर सांधार शैली का है जिसमें प्रदक्षिणा पथ बना हुआ है !

गोविन्ददेव जी की पूजा-विधि ‘अष्टयाम सेवा’ के नाम से प्रसिद्ध है !

शिलामाता का मंदिर, आमेर  Shilamata Temple, Amer –

जयपुर के मंदिर के राजप्रासाद के जलेब चौक के दक्षिण-पश्चिम कोने में शिलादेवी का दुग्ध धवल मंदिर है ! और शिलामाता कच्छवाहा राज परिवार की आराध्य देवी थी ! शिलामाता की यह मूर्ति पाल शैली में काले संगमरमर में निर्मित है ! इस मूर्ति को जयपुर के महाराजा मानसिंह प्रथम 1604 ई. में बंगाल से लाये थे !
वर्तमान में बने जयपुर के मंदिर का निर्माण सवाई मानसिंह द्वितीय (1922-1949 ई.) ने करवाया था ! यह मूर्ति बंगाल के राजा केदार कायथ के राज्य में पूजान्तर्गत थी ! मूर्ति की यह प्रसिद्धि थी कि जहाँ यह मूर्ति पूजित होती है उसे कोई जीत नहीं सकता ! यहाँ राजपरिवार की ओर से सर्वप्रथम पूजा करने के बाद ही जनसामान्य के लिए मंदिर के द्वार खुलते हैं ! नवरात्रों में यहाँ छठ  के मेले का आयोजन किया जाता है !

इतिहास के अनुसार प्रारम्भ में शिला माता को मानव की बलि दी जाती थी बाद में जब उसे भैंसे की बलि दी गई ! तो माता ने उसे अस्वीकार कर दिया और अपना मुँह फेर लिया ! आज भी माता का मुंह हल्का सा टेढ़ा है वर्तमान में माता को शराब का भोग लगता है ! तथा चाहने पर माता के भक्तों को जयपुर के मंदिर में प्रसाद में मिलती है

 शिलादेवी संग विराजमान हिंगलाज माता जयपुर hinglaj mata Temple jaipur –

जयपुर के मंदिर के शिलामाता मंदिर में शिलादेवी के संग हिंगलाज माँ भी विराजमान है ! कच्छवाहों के ढूंढाड़ आगमन के पहले से ही मीणा शासक अधिष्ठाता देवी के रूप में हिंगलाज माता की आराधना करते थे ! ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्ध देवियों में सिरमौर हिंगलाज माता का सिद्ध शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में है ! पन्द्रहवीं शताब्दी में महाराजा मानसिंह (प्रथम) ने आमेर में शिलामाता के साथ हिंगलाज माता की भी स्थापना की ! आमेर के बाद बनी राजधानी जयपुर के शासकों द्वारा युद्ध में विजय व सरक्षा के लिए शिलादेवी के साथ हिंगलाज माता की भी पूजा अर्चना होती रही है ! युद्ध में जाने से पहले राजा-महाराजा हाथ के चूड़े में हिंगलाज माता का स्वरूप धारण करते थे !

  • प्रथम आदि शक्तिपीठ है हिंगलाज

राजा दक्ष के महायज्ञ में पति भगवान शिव के अपमान से दु:खी होकर सती (मां पार्वती) ने यज्ञ वेदी की अग्नि में शरीर त्याग दिया ! इससे क्रोधित शिव ने तांडव नृत्य कर महायज्ञ का विध्वंस कर दिया ! और सती के शरीर को कंधे पर रखकर सर्वत्र घूमने लगे ! भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शव के बलूचिस्तान में गिरा ! जो प्रथम आदि शक्तिपीठ हिंगलाज का सिद्धपीठ बना सिन्दूर को हिंगलू कहा जाता है ! इसी हिंगलू से हिंगलाज शब्द प्रचलन में आया ! यह जयपुर के मंदिर में दर्सन योग्य है  जिससे आपको लाभ होगा !

विश्व का एकमात्र कल्की मंदिर जयपुर Kalki Mandir Jaipur –

जयपुर के मंदिर में बड़ी चौपड़ के नीचे कलयुग के अवतार कल्की भगवान का ऐतिहासिक विष्णु मंदिर है ! यह मंदिर संसार का पहला कल्की मंदिर है ! मंदिर में कल्की का अवतार धारण करने के लिए छतरी में संगमरमर का एक अद्भुत घोड़ा भी है ! घोड़े के बारे में मान्यता है, कि इसके खुर्र में एक छोटा सा गड्डा है जो धीरे-धीरे भर रहा है ! जिस दिन यह गड्डा पूरी तरह भर जाएगा उस दिन कलयुग का अंत करने के लिए ! जयपुर के मंदिर में विराजमान विष्णु भगवान कल्की का अवतार धारण कर इस घोड़े पर सवार होंगे !

घोड़े पर बैठ भगवान विष्णु मंदिर परिसर की परिक्रमा कर संसार को नष्ट करने के साथ कलयुग का अंत करेंगे ! इस जयपुर के मंदिर का निर्माण जयपुर के संस्थापक सवाई जयसिंह ने 1739 ई. में किले की बुर्जनुमा दक्षिणायन शिखर शैली में करवाया था ! देवस्थान विभाग ने भी घोड़े की प्रतिमा के बाहर लिखा है कि इस घोड़े के बायें पैर का गड्डा स्वतः भर रहा है ! इसके पूरा भर जाने पर कल्की भगवान प्रकट होंगे ! संस्कृत विद्वान देवर्षि कलानाथ शास्त्री के अनुसार सवाई जयसिंह संसार में ऐसा पहला शासक था ! जिसने जिस देवता का अवतार अब तक नहीं हुआ ! उसके बारे में पुराणों के आधार पर कल्की देवता की कल्पना की !

मंदिर से कल्की देवता की शोभा यात्रा भी निकाली जाती है ! जयसिंह के दरबारी कवि कलानिधि देवर्षि श्री कृष्ण भट्ट ने भी ईश्वर विलास महाकाव्यम् में कल्की अवतार का उल्लेख किया है !

इतिहास के अनुसार महाराजा ईश्वरीसिंह की रानी जादौन जी के एक पुत्र कल्की का जन्म हुआ था ! इसकी कम आयु में मृत्यु होने पर सवाई जयसिंह ने कलयुग की कल्पना के आधार पर अपने पौते की याद में इस जयपुर के मंदिर का निर्माण करवाया था !

जगत् शिरोमणि मंदिर जयपुर Jagat Shiromani Mandir Jaipur

आम्बेर के राजमहलों के उत्तर-पश्चिम में पहाड़ी के तलहटी में जगत् शिरोमणि का भव्य वैष्णव जयपुर के मंदिर बना है ! जो हिन्दू मंदिर स्थापत्य का सुंदर उदाहरण है ! इस भव्य जयपुर के मंदिर का निर्माण मानसिंह प्रथम की रानी कनकावती ने अपने दिवंगत ज्येष्ठ पुत्र युवराज जगतसिंह की 1594 ई. में असामयिक मृत्यु होने पर उनकी स्मृति को अक्षुण्ण रखने हेतु करवाया ! सफेद संगमरमर, लाल पाषाण और स्थानीय दानेदार बलुआ पाषाण से निर्मित ! जगत् शिरोमणि मंदिर भव्य और विशाल है, जिसके चारों कोनों में सुंदर कलात्मक छतरियाँ बनी हुयी हैं !

मूल प्रसाद त्रिभंगाकार है और विशाल उतंगु शिखर युक्त है ! और जगत् शिरोमणि जयपुर के मंदिर की मुख्य शोभा और आकर्षण मंदिर के गर्भगृह के सम्मुख एक ऊँची पीठ पर स्तम्भ युक्त चतुष्कोण मण्डल गृह बना है ! जिसके मध्य में गरुड़ पीठिका है जिसका मुख गर्भगृह की ओर है ! यह सम्पूर्ण मण्डप गरुड़ छतरी के नाम से विख्यात है !

  • मीरा मंदिर

इस जगत् शिरोमणि मंदिर में विराजमान भगवान कृष्ण की प्रतिमा के लिए कहा जाता है कि यह चित्तौड़ से लायी गई थी ! और यह वही मूर्ति है जिसकी पूजा मीरा बाई किया करती थी ! लोकमान्यता है कि मीरा और कृष्ण की ये प्रतिमाएं महाराजा मानसिंह चित्तौड़ के मीरा मंदिर से लाये थे ! यह जयपुर के मंदिर ‘मीरा मंदिर’ के नाम से भी जाना जाता है !

शिरोमणि मंदिर के मुख्य गर्भगृह का बाह्य भाग ऊर्ध्वछन्द पीठ, मंडोवर व शिखर युक्त है ! व जगत् शिरोमणि मंदिर महामेरु प्रासाद शैली अथवा खजुराहो पद्धति पर बना है ! इस शैली के मंदिरों के लिए प्रासाद मण्डन में  लिखा है कि उसे राजा द्वारा ही बनाया जाना चाहिए, अन्य द्वारा नहीं ! और इसमें 1001 तक लघु शिखर हो सकते हैं ! इस जगत् शिरोमणि मंदिर पंचायतन शैली का जयपुर के मंदिर है !

नृसिंह मंदिर जयपुर Narsingh Jaipur Temples –

आम्बेर का नृसिंह मंदिर अपनी भव्यता तथा प्राचीनता के कारण सुप्रसिद्ध है ! यह जयपुर के मंदिर आम्बेर नगरी के पिछवाड़े में प्राचीन कदमी महल में विद्यमान है ! इस मूर्ति के लिए कहा जाता है ! कि राजा पृथ्वीराज की की बालबाई के गुरु कृष्णदास पयहारी ने नृसिंह जी की मूर्ति प्रदान की थी ! कहा था कि जब तक नृसिंह जी आपके महल में रहेंगे तब तक आपका राज भी सदैव रहेगा !

प्रारंभ में नृसिंह भगवान की जो मूर्ति स्थापित की गई थी वह बाद में टूट गयी थी ! और उसके चोरी होने की बात भी सामने आती है ! तदुपरान्त नृसिंह भगवान की एक छोटी प्रतिमा पुनः स्थापित की गई तथा विशाल तोरण द्वार है !

जिसमें भगवान को झुलाने के लिए एक डोला बना हुआ है ! तोरण द्वार को मिर्जा राजा जयसिंह की माता दमयन्ती ने बनवाया था ! इस तोरण द्वार में आम्बेर के राजाओं का तिलक किया जाता था ! इस प्रकार प्राचीनता की दृष्टि से यह जयपुर के मंदिर महत्वपूर्ण है !

संघी झंथाराम का मंदिर Jaipur Temples of Sanghi Jhantharam –

आम्बेर में विशाल एवं भव्य जयपुर के मंदिर स्थित है जो एक सुदृढ़ परकोटे से घिरा है ! यह संघी झुंथाराम मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है ! वर्तमान में यह शिव मंदिर कहलाता है ! साक्ष्यों के अनुसार यह मूलत: एक जैन मंदिर है, जो जैन तीर्थंकर विमलनाथ को समर्पित था ! इस मंदिर का निर्माण आम्बेर के यशस्वी शासक मिर्जा राजा जयसिंह के दीवान (प्रधानमंत्री) मोहनदा खण्डेलवाल ने करवाया था ! इस मंदिर की वेदिका में जैन तीर्थंकर की प्रतिमाएं स्थापित होनी थी, ! किन्तु राजनैतिक कारणवश स्थापित नहीं हो पायी ! बाद में इस देवालय में कुल 12 शिवलिंग प्रतिष्ठित होने के कारण यह शिवालय द्वादश ज्योति लिंगेश्वर महादेव मंदिर कहलाता है !

लाड़ली जी का मंदिर Ladli ji’s Jaipur Temples –

लाड़ली जी का मंदिर दक्षिणमुखी ऊँची जगती पर रामगंज बाजार में स्थित है ! मंदिर अंदर से गुलाबी रंग से रंगा हुआ है तथा दीवारों पर चित्रांकन मिलता है ! ठाकुर जी श्री किशोरी रमण जी ऊर्फ लाड़ली जी मंदिर का निर्माण संवत् 1823 में हुआ ! वर्तमान में यह जयपुर के मंदिर राजकीय देवस्थान विभाग के राजकीय सुपुर्दगी के मंदिरों की सूची में है, ! किंतु वर्तमान महंत इसे निजी सेवा का मंदिर बताते हैं !

चरण मंदिर Charan Jaipur Temples  –

जयपुर के मंदिर में यह जयपुर शहर के उत्तर में पहाड़ी के ऊपर यह मंदिर है जो जयगढ़ एवं नाहरगढ़ मध्य में है ! यह मान्यता है कि यहां पर श्री कृष्ण अपनी गाय चराने आया करते थे इसलिए उनके पद चिन्ह सुरक्षित रखे गये हैं ! तथा पूजे जाते हैं जब जयगढ़ और नाहरगढ़ का पुनः निर्माण करवाया गया ! तभी इस मंदिर का निर्माण किया गया !

अन्य मंदिर जयपुर Other Temples Jaipur –

जयपुर के मंदिर में यह और मंदिर है  गंगा गोपालजी का मंदिर, ब्रज निधि मंदिर, आनंद कृष्ण मंदिर, श्री मदन गोपाल जी का मंदिर, ! श्री राधा दामोदर जी का मंदिर, मंदिर श्री विनोदी लाल जी, मंदिर श्री ब्रजनिधि जी, मंदिर श्री गोवर्धन नाथ जी (हवामहल), बाँकड़ा बिहारी मंदिर,!  विजय गोविन्ददेव जी का मंदिर, महंगी के महादेव, लक्ष्मणद्वारा मदनमोहन मंदिर, राजराजेश्वर मंदिर, श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर, !  श्री गोपीजन वल्लभ मंदिर, बलदाऊजी का मंदिर, गोवर्धन नाथ मंदिर, मेहताब बिहारी जी का मंदिर, ब्रजराज बिहारी जी का मंदिर,!

चन्द्रमोहनजी का मंदिर तथा राधा किशनजी का मंदिर दर्शनीय हैं। बिड़ला मंदिर (लक्ष्मीनारायण मंदिर), गणेश मंदिर (जयपुर), ! शाकम्भरी माता का मंदिर-सांभर, शीतला माता का मंदिर-शीलडूंगरी (चाकसू), पद्म प्रभु मंदिर-बाड़ा, नकटी माता का मंदिर-भवानीपुरा,!  जमवाय माता का मंदिर (बुडवाय माता का मंदिर)-जमवारामगढ़, अम्बिकेश्वर मंदिर-आमेर, कल्याण मंदिर-आमेर, नटवरजी मंदिर-आमेर, ! वाराही माता का मंदिर-आमेर, धनुषधारी निझरा वाले हनुमानजी का मंदिर-आंकड़ गांव (आमेर), !  जगदीश मंदिर-गोनेर, ज्वाला माता का मंदिर-जोबनेर आदि अन्य प्रसिद्ध मंदिर हैं ! Jaipur Temples


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