जालौर दुर्ग की पूरी जानकारी Jalore Fort

हेलो दोस्तों आज हम राजस्थान के जालौर जिले में स्थित सुवर्ण गिरि या जालौर दुर्ग के इतिहास के बारे में जानेगे 

जालौर दुर्ग सुवर्णगिरि का परिचय Introduction to Jalore Fort Suvarnagiri In Hindi

  • पूरा नाम  – जालौर दुर्ग ( Jalore Fort )
  • जालौर दुर्ग के अन्य नाम  – सुवर्ण गिरि दुर्ग, जालहूर , कनकाचल, सोनलगढ़ (सोनगिरि)
  • निर्माण करवाया  – प्रतिहार राजा नागभट्ट प्रथम ने
  • निर्माण कब हुआ –  10 वीं शताब्दी मे
  • किले के दरवाजे – 4 दरवाजे है
  • दुर्ग के दरवाजो के नाम –  मुख्य दरवाजा ,सिरेपोल दरवाजा , ध्रुवपोल , चंद्रपॉल

जालौर दुर्ग का इतिहास History of Jalore Fort In Hindi

जालौर दुर्ग प्राचीन अभिलेखों में जालौर का नाम जाबालीपुर’ व ‘जालहुर’ नाम मिलता है ! और जालौर दो शब्दों ‘जाल’ (जाल एक पेड़ का नाम है ! जो इस क्षेत्र में बहुत अधिक पाया जाता है ) और ‘लौर’ (लौर का अर्थ सीमा से है) अर्थात् जाल के पेड़ों के क्षेत्र की सीमा वाला क्षेत्र ‘जालौर’ कहलाता है ! जालौर दुर्ग का निर्माण प्रतिहार राजा नागभट्ट प्रथम ने अरबी आक्रमणों से मुकाबला करने हेतु करवाया था ! तथा इतिहासकार डॉ. गौरीशंकर हीराचंद औझा ने परमारों को जालौर दुर्ग का निर्माता बताया ! परंतु ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार 10वीं शताब्दी में धारा वर्ष परमार द्वारा इसका पुनःनिर्माण करवाया गया था ! यह दुर्ग गिरि दुर्ग व वन दुर्ग की श्रेणी में आता है जिसका निर्माण लूनी नदी की सहायक नदी ‘सूकड़ी नदी’ के बाईं तरफ स्थित ‘सोनगिरि’ (स्वर्णगिरि) व ‘कनकाचल पहाड़ी’ पर गोल आकृति में 295 x 145 मीटर की परिधि में करवाया गया !

धरातल से जालौर दुर्ग की ऊँचाई 425 मीटर है  और यह दुर्ग सोनगिरि, सुवर्णगिरि, सोनलगढ़, कांचनगिरि आदि नामों से जाना जाता है ! यह पहाड़ी जालंधरनाथ की तपोस्थली थी और इसे जालंधर दुर्ग भी कहते हैं ! जालौर दुर्ग पश्चिमी राजस्थान का सबसे पुराना और मजबूत दुर्ग है ! जालौर दुर्ग की दुर्जेय स्थिति को देखकर हसन निजामी ने अपनी पुस्तक ‘ताज-उल-मासिर’ में लिखा है कि “जालौर दुर्ग बहुत ही ज्यादा शक्तिशाली और अजेय दुर्ग है ! जिसके द्वार कभी भी किसी भी विजेता के द्वारा नहीं खोले गये चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो ! 1311 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर दुर्ग को जीतकर इसका नाम ‘जलालाबाद’ कर दिया ! इस दुर्ग में प्रतिहार वत्सराज के शासन में 778 ई. के अंदर जैन आचार्य उद्योतन सूरी के द्वारा लिखित अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कुवलयमाला’ की रचना की ! मारवाड़ के शासकों का सुरक्षित कोष इसी दुर्ग में रखा जाता था !

दुर्ग के प्रमुख दर्शनीय स्थल

  •  तोप मस्जिद –

जालौर दुर्ग का तोपखाना बहुत सुदंर है जिसका निर्माण परमार राजा भोज द्वारा संस्कृत पाठशाला के रूप में करवाया गया ! कालांतर मे अलाउद्दीन खिलजी के शासन काल में इसे मस्जिद का रूप दे दिया गया ! और यह अलाउद्दीन खिलजी की मस्जिद व ‘तोप मस्जिद’ कहलाने लगी !  जालंधर नाथ की छतरियाँ व गुफा, महाराजा मानसिंह के प्रमुख महल !  प्राचीन जैन मंदिर एवं चामुंडा माता और जोगमाया के मंदिर
परमार कालीन, कीर्ति स्तंभ, दहिया की पाल आदि ! इस दुर्ग में अन्य दर्शनीय स्थल हैं !

इस दुर्ग में स्थित ‘झालर’ और ‘सोहन’ बावड़ी अपने मीठे पानी के लिए प्रसिद्ध हैं !

जालौर दुर्ग का साका Saka of Jalore Fort In Hindi

जालौर दुर्ग  1298 ई. में अलाउद्दीन खिलजी की शाही सेना गुजरात जीतने के लिए उलूगखाँ (अलाउद्दीन का भाई) और नुसरत खाँ के नेतृत्व में जा रही थी ! चूँकि गुजरात जाने का सीधा रास्ता मारवाड़ (जालौर) होकर था परंतु कान्हड़दे ने उस शाही सेना को जालौर मार्ग से नहीं जाने दिया ! शाही सेना मारवाड़ के मार्ग को छोड़कर मेवाड़ के मार्ग से निकल गई !और गुजरात काठियावाड़ को जीतकर सोमनाथ के मंदिर व शिवलिंग को तोड़कर वापिस दिल्ली के लिए रवाना हुई !

इस बार शाही सेना जालौर होकर दिल्ली जाने की सोची तो कान्हड़दे ने शाही सेना को अचछा सबक सिखाने का निश्चय कर लिया ! कान्हड़दे की ओर से जेता व देवड़ा (कूपा) के नेतृत्व में राजपूतों ने शाही सेना के ऊपर  धावा बोल दिया ! गुजरात के द्वारा की गई लूट का कुछ अंश लूट लिया ! कहा जाता है कि सोमनाथ की मूर्ति के पाँच टुकड़े भी राजपूतों के हाथ लग गए ! जिन्हें बाद में कान्हड़दे ने शिव मंदिरों में प्रतिष्ठित करवाया ! इस अभियान के दौरान कान्हड़दे के विरोधी आचरण के कारण अलाउद्दीन खिलजी काफी क्रोधित हुआ !

पाँच वर्ष बाद 1305 ई. में ‘एन-उल-मुल्क मुल्तानी’ को जालौर दुर्ग पर आक्रमण करने के लिए भेजा ! जिससे कान्हड़दे व अलाउद्दीन खिलजी के मध्य समझौता हुआ और कान्हड़दे ने अपने पुत्र वीरमदेव को अलाउद्दीन खिलजी के राज दरबार में नियुक्त किया ! वहाँ पर अलाउद्दीन के हरम की राजकुमारी फिरोजा वीरम देव को चाहने लगी ! अलाउद्दीन को पता चलने पर शुरू में तो राजकुमारी को डराधमका कर वीरम का विचार छोड़ने को कहा ! परंतु न मानने पर शादी करने के लिए राजी हो गया ! उसने वीरमदेव को उसकी पुत्री से शादी करने के लिए कहा तो वीरमदेव चुपचाप जालौर भाग गया !

अलाउद्दीन का अपमान जालौर पर आक्रमण Attack on Jalore Fort In Hindi

अलाउद्दीन इसको अपना’अपमान माना और उसने जालौर दुर्ग पर आक्रमण करने के लिए कमालुद्दीन गुर्ग के नेतृत्व में सेना भेजी ! शुरू में कमालुद्दीन ने सिवाणा दुर्ग को जीता फिर जालौर दुर्ग को 1311 ई.को आ घेरा ! कमालुद्दीन गुर्ग ने यहाँ के सेनापति दहिया राजपूत बीका को दुर्ग का लालच देकर दुर्ग का गुप्त रास्ता जान लिया ! यह बात दहिया राजपूत बीका ने रात को अपनी पत्नी ‘क्षत्रिया’ को बताया तो क्षत्रिया ने उसके पति की रात को हत्या कर कान्हड़दे को सारी बात बताई ! लेकिन उस समय काफी देर हो गई थी मुगल सेना दुर्ग के अंदर आ गई ! 1311 ई. में कान्हड़दे युद्ध में मारा गया ! वीरम देव अपनी आराध्य देवी आशापुरा माता के सामने कटार घोंप कर आत्महत्या कर ली ! और राजपूत रानियों ने जौहर किया !

बाद में कमालुद्दीन गुर्ग ने वीरमदेव का सिर काटकर दिल्ली ले गया जहाँ राजकुमारी ने उसका विधिवत् ढंग से दाह संस्कार करवाया !
और स्वयं भी यमुना में कूदकर जान दे दी ! इस किले के कमजोर भाग को जाँचने हेतु राइयों को महँगे दामों पर खरीदकर प्रयोग किया ! और जालौर दुर्ग के लिए ‘राइयों का भाव राते बीता’ कहावत प्रचलित है !


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