जोधपुर के ओसियाँ मंदिर की पूरी जानकारी Osian Temple Jodhpur

राजस्थान के जोधपुर के ओसियाँ मंदिर Osian Temple of Jodhpur –

  • मंदिर – ओसियाँ का मंदिर
  • स्थान – जोधपुर से 57 कि.मी. दूर ओसियाँ

जोधपुर के मंदिर जोधपुर से 57 कि.मी. दूर दक्षिण-पश्चिम दिशा में ओसियाँ स्थित है ! यहां 8वीं शताब्दी के बने वैष्णव व जैन मंदिर समूह गुर्जर-प्रतिहार कला के प्रमुख केन्द्र थे ! और 8वीं व 9वीं शताब्दी में यह हिन्दू, वैष्णव व जैन धर्मावलम्बियों का प्रमुख तीर्थस्थल रहा ! साहित्यिक वर्णनों में ओसियाँ नगर एक महत्वपूर्ण समृद्ध व्यापारिक नगरी के रूप में विख्यात था ! यहां पर पारम्परिक ढंग से वैष्णव, शैव और जैन मंदिरों का निर्माण हुआ ! प्रतिहारकालीन यह कला गुप्तकाल के अंतिम चरण व स्थानीय विशेषताओं को अपने में संजोये हुए हैं !

जोधपुर जिले में ओसियाँ का मंदिर एक प्रकार का देवालय नगर है ! यहां पर लगभग 16 हिन्दू और जैन मंदिरों के अवशेष हैं ! ये मंदिर दो स्थलों में केन्द्रित हैं ! प्रथम वर्ग के मंदिर 8वीं व 9वीं शताब्दी के हैं जो ग्यारह मंदिर हैं जिनका निर्माण ओसियां उपकेश खण्ड में ही हुआ तथा शेष पश्चात्कालीन हैं  जिन्हें 10 वीं-11वीं शताब्दी में ओसियाँ के पूर्व में स्थित पहाड़ी पर बनाया गया था ! अधिकांश मंदिर ध्वस्त किये जा चुके हैं ! वास्तुशिल्प की दृष्टि से ये मंदिर उड़ीसा के प्रारंभिक काल के मंदिरों के ही समान हैं तथा अलंकरण में कोणार्क के सूर्य मंदिर के समान ! इन्हें खजुराहो के मंदिरो की भांति ऊँचे अधिष्ठान पर आधारित किया गया है ! यह जोधपुर के ओसियाँ के ये सभी मंदिर शिल्पकाल एवं प्रतिमा विज्ञान की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं !

ओसियाँ के वैष्णव मंदिरों में हरिहर मंदिर व सूर्य मंदिर प्रमुख हैं !

पीपला माता तथा सचिया माता के मन्दिर ओसियाँ

 जैन मंदिरों में महावीर का मंदिर तथा शाक्त मंदिरों में – पीपला माता तथा सचिया माता के मंदिर प्रमुख हैं ! 8वीं शताब्दी तक बुद्ध का वैष्णव अवतारों में समावेश हो चुका था ! इसी के साथ ही शिव-विवाह, बुद्ध प्रतिमा, शृंगार-दुर्गा आदि दुर्लभ प्रतिमाओं के प्रस्तुतिकरण के तो ओसियाँ के ये सभी मंदिर धार्मिक एकता के जीते-जागते प्रमाण हैं साथ-साथ शिव के विविध रूप व विष्णु अवतारों का प्रतिहारकालीन मंदिरों में सदैव ही प्रभुत्व बना रहा ! अतः देखा जाये तो ओंसिया के ये सभी मंदिर धार्मिक एकता के जीते जागते प्रमाण मिलते है !

ओसियाँ के प्रसिद्ध मंदिरों की प्रमुख शिल्पाकृतियाँ

जोधपुर के मंदिर में ओसियाँ के प्रसिद्ध ‘हरिहर मंदिर’ में विष्णु के नरसिंह एवं हरिहर स्वरूप को अधिक विस्तृत रूप से प्रस्तुत किया गया है ! प्रारंभिक शैली में बनाये गये यहां तीन मंदिर समूह हरिहर को ही समर्पित हैं ! इनमें शिखरों की भांति हैं परन्तु कंगूरे अधिक विस्तृत हैं ! तीसरे मंदिर का मण्डप एक खुला परिस्तम्भित कक्ष मात्र है ! मंदिर ज-लक्ष्मी, लक्ष्मी, मातृका, महिषमर्दिनी आदि देवियों की प्रतिमाएं हरिहर मंदिर के विभिन्न भागों में देखी जा सकती हैं ! मंदिर का प्रत्येक अंश सुंदर शिल्पाकृतियों से सुशोभित किया गया है !

इन वैष्णव मंदिरों से कुछ ही दूरी पर यहां का प्रसिद्ध ‘सूर्य मंदिर’ है जिसमें गर्भगृह, अंतराल, खुला प्रदक्षिणा पथ, सभा-मण्डप तथा द्वार-मण्डप है ! यह मंदिर पंचायतन (पंच रूप) प्रकार है ! इसके चार गौण मंदिर एक हॉल द्वारा मुख्य मंदिर से जुड़े हुए हैं ! इस मंदिर के गर्भगृह में कोई देव प्रतिमा नहीं है ! गर्भगृह के प्रवेश द्वार के सिरदल, प्रमुख ताखों, गर्भगृह के बाह्य अलंकरण अनेक प्रकार के हैं !

सिरदल की मुख्य प्रतिमा लक्ष्मीनारायण की है, जिसके दोनों ओर गणेश, ब्रह्मा, कुबेर एवं शिव की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं ! गर्भगृह के बाहर महिषमर्दिनी, सूर्य एवं गणेश की प्रतिमाएँ उत्कीर्ण हैं ! सूर्य प्रतिमा के अतिरिक्त अन्य सभी मूर्तियाँ यहां वैष्णव या शैव संप्रदाय की हैं !

वैष्णव मन्दिर

जोधपुर के मंदिर की बात की जाये तो वैष्णव मंदिरों के अतिरिक्त यहां के शाक्त मंदिरों में पीपला माता तथा सचिया माता के मंदिर भी प्रसिद्ध है ! ये मंदिर 10वीं-11वीं शती के हैं ! पीपला माता का मंदिर सूर्य मंदिर के निकट ही है ! यहां के गर्भगृह में ऊँचे आसन पर कुबेर, महिषमर्दिनी की प्रतिमाएँ तारणों में उत्कीर्ण हैं ! सचिया माता का मंदिर जो महिषमर्दिनी का ही एक अन्य नाम है, ओसियाँ ग्राम के निकट की एक पहाड़ी पर बना है ! जिसके चारों ओर अनेक वैष्णव मंदिर बने हुए हैं ! यह मंदिर हिन्दू तथा जैन दोनों ही सम्प्रदायों के पवित्र तीर्थ स्थल के रूप में मान्य है ! कहते हैं कि सचिया माता के दर्शन किये बिना जैन तीर्थ यात्रियों की यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती !

ओसियाँ वर्ग के मंदिरों में सर्वाधिक पूर्ण मंदिर के रूप में महावीर (जैन मंदिर) मंदिर का उल्लेख किया जा सकता है ! इस मंदिर में गर्भगृह, सभागृह, एक बन्द कक्ष तथा सामने खुला हुआ मण्डप हैं जिसमें अलंकृत तोरण बना हुआ है ! चारों ओर अनेक देवी-देवताओं, यक्ष-यक्षिणियों की प्रतिमाएं उत्कीर्ण हैं ! इस जैन मंदिर को प्रतिहार नरेश वत्सराज ने संभवतया 10वीं शताब्दी में निर्मित कराया ! मंदिर का अलंकृत तोरण अथवा मेहराब युक्त प्रवेश द्वार सम्भवतया 11वीं शताब्दी में बनाया गया होगा, क्योंकि स्तम्भों व तोरणद्वार की शैली में स्पष्टतया अंतर दिखाई देता है !

मंडोर , जोधपूर –

 मारवाड़ क्षेत्र में आठवीं, नवीं तथा दसवीं शताब्दियों में गुर्जर-प्रतिहार नरेशों के राज्यकाल में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ ! जिसे प्रतिहार शैली के नाम से पुकारते हैं ! मंडोर के वैष्णव मंदिर के अवशेष तथा तोरणद्वार के दो कृष्णलीला युक्त स्तम्भ, जो अब जोधपुर संग्रहालय में हैं, यहां के प्राचीन अवशेष हैं ! ये तोरण सम्भवतया कुषाण युग के हैं जिन्हें प्रतिहारकालीन मंदिरों में पुनः काम में लाया गया !

अन्य मन्दिर  –

चामुण्डा देवी का मंदिर-मेहरानगढ़, मुरली मनोहर मंदिर एवं आनन्दघन मंदिर-मेहरानगढ़, बाणगंगा मंदिर-बिलाड़ा, ब्राह्मणी का मंदिर-फलौदी, रणछोड़जी मंदिर-जोधपुर, गंगश्याम मंदिर एवं घनश्याम मंदिर-जोधपुर, लटियालजी का जैन मंदिर-कापरड़ा, आईमाता (सिरवी लोगों की कुल देवी)-बिलाड़ा, महामंदिर-जोधपुर !


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