बाबा रामदेव जी की जीवनी Baba Ramdev Ji

बाबा रामदेव जी एक वीर योद्धा होने के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे ! उनका जाति व्यवस्था और वर्ण व्यवस्था में बिल्कुल भी विश्वास नहीं था

लोक देवता बाबा रामदेव जी का जीवन परिचय Lok Devta Biography of Baba Ramdev Ji in hindi

  • नाम – रामदेव जी , रामसा पीर,’रुणीचा रा धणी
  • पिता – तँवर वंशीय ठाकुर अजमाल जी
  • माता – मैणादे
  • बहन – सुगना
  • जन्म – भाद्रपद शुक्ल द्वितीया वि.स. 1409
  • जन्म स्थान – रुणिचा
  • समाधी – रुणीचाके राम सरोवर के किनारे जीवित समाधि ली
  • गुरु – बालीनाथ
  • प्रतीक चिन्ह – पगलिया
  • उत्तराधिकारी – अजमल जी
  • जीवन संगी – अमरकोट (वर्तमान में पाकिस्तान में) के सोढ़ा राजपूत दलै सिंह की पुत्री निहालदे (नेतलदे) के साथ हुआ था।
  • राज घराना – तोमर वंशीय राजपूत
  • वंशज -अर्जुन के माने जाते हैं।
  • धर्म  – हिन्दू
  • मृत्यु  – वि.स. 1442
  • मृत्यु स्थान – रामदेवरा

लोक देवता बाबा रामदेव जी सम्पूर्ण राजस्थान, गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, पंजाव आदि राज्यों में रामसा पीर’,’रुणीचा रा धणी’ व बाबा रामदेव’ आदि नामों से प्रसिद्ध है ! रामदेव जी ने समाज में व्याप्त छूआ-छूत, ऊँच-नीच आदि बुराइयों को दूर कर सामाजिक समरसता स्थापित की थी ! और सभी जातियों (विशेषतः निम्न जातियों के)एवं सभी समुदायों के लोग इनको पूजते हैं ! ये अपनी वीरता और समाज सुधार के कारण पूज्य हुए !

बाबा रामदेव जी को हिन्दू कृष्ण का अवतार मानते है तथा मुसलमान ‘रामसा पीर’ के रूप में मानते है और इनकी पूजा भी करते हैं ! रामदेव जी के बड़े भाई वीरमदेव को ‘बलराम का अवतार’ माना जाता है ! रामदेवजी को ‘विष्णु का अवतार’ भी मानते हैं !
कामड़िया पंथ रामदेवजी से हि आरम्भ हुआ था इनके गुरु का नाम बालीनाथ था ! ऐसी मान्यता है कि रामदेवजी ने बाल्यावस्था में ही सातलमेर (पोकरण ) क्षेत्र में तांत्रिक भैरव राक्षस का वध कर उसके आतंक को समाप्त किया ! और जनता को कष्ट से मुक्ति दिलाई बाबा रामदेव जी ने पोकरण कस्बे को पुनः बसाया तथा रामदेवरा (रुणेचा) में रामसरोवर का निर्माण करवाया !

रामदेवरा ( रुणीचा ) Ramdevra (Runicha) –

रामदेवरा (रुणीचा) में बाबा रामदेव जी का विशाल मंदिर है जहाँ हर वर्ष भाद्रपद शुक्ला द्वितीया से एकादशी तक विशाल मेला भरता है ! पूरी श्रद्धा के साथ लोग आते हैं ! बाबा रामदेव जी के मेले की मुख्य और प्रमुख विशेषता है की साम्प्रदायिक सद्भाव है, क्योंकि यहाँ हिन्दू-मुस्लिम एवं अन्य धर्मों के लोग बड़ी मात्रा श्रृद्धालुओं की भीड़ ‌लगी रहती है !
भाद्रपद द्वितीया को जन्मोत्सव एवं भाद्रपद दशमी को समाधि उत्सव होता है ! इस मेले का दूसरा आकर्षण बाबा रामदेव जी की भक्ति में कामड़ जाति की स्त्रियों द्वारा किया जाने वाला तेरहताली नृत्य है ! इनके अन्य मंदिर जोधपुर के पश्चिम में मसूरिया पहाड़ी पर, बिराँटिया (ब्यावर, अजमेर) एवं सुरताखेड़ा (चित्तौड़गढ़) में भी हैं ! जहाँ इनके मेले भरते हैं इनका एक मंदिर छोटा रामदेवरा’ गुजरात में भी है !

पीर बाबा रामदेवजी Peer Baba Ramdevji –

  • पीर बाबा रामदेव जी के प्रतीक चिन्ह के लिए खुले चबूतरे पर आला बनाकर उसमें संगमरमर या पीले पत्थर के इनके पगल्ये या पगलिए,चरण चिह्न बनाकर गाँव-गाँव में पूजे जाते हैं ! इनके मेघवाल भक्त जनों को रिखिया कहते हैं ! रामसा पीर रामदेवजी के भक्त इन्हें श्रद्धापूर्वक कपड़े का बना घोड़ा चढ़ाते हैं रामदेव जी का घोड़ा ‘लीला’ था !
  •  भाद्रपद शुक्ला द्वितीया ‘बाबेरी बीज’ (दूज) के नाम से पुकारी जाती है ! तथा यही तिथि बाबा रामदेव जी के अवतार की तिथि के रूप में भी लोक प्रचलित है !
  • रामदेव जी के चमत्कारों को पर्चा’ एवं इनके भक्तों द्वारा गाये जाने वाले भजनों को  ब्यावले कहते हैं !
  • रामदेवजी के मंदिरो को ‘देवरा’ (या देवल) कहा जाता है ! जिन पर श्वेत या 5 रंगों की ध्वजा, नेजा’ फहराई जाती है ! ध्वजा पर लाल रंग के कपड़े से बाबा रामदेव जी के चरण बने होते हैं !
  •  बाबा रामदेवजी ही एक मात्र ऐसे देवता हैं जो की एक कवि भी थे इनके द्वारा रचित ‘चौबीस बाणियाँ’ प्रसिद्ध हैं !
  • और रामदेवजी के नाम पर भाद्रपद द्वितीया व एकादशी को रात्रि जागरण किया जाता है, जिसे ‘जम्मा’ कहते हैं ! भक्तजन ‘रिखियों’ से जम्मा कराते हैं !

डालीबाई रामदेव जी भक्त (धर्म बहन) Dalibai Ramdev Ji Bhakt (Religion Sister) –

  • डालीबाई बाबा रामदेव जी की अनन्य भक्त थी रामदेव जी ने इसे अपनी धर्म बहन बनाया था ! डाली बाई ने रामदेव जी से एक दिन पूर्व उनके पास ही जीवित समाधि ले ली थी वहीं डाली बाई का मंदिर है !
  • मक्का से आये पाँच पीरों को रामदेवजी ने ‘पंच पीपली’ स्थान पर पर्चा दिया था ! इन पंच पीरों ने बाबा रामदेव जी की शक्तियों एवं चमत्कारों से हड्बू अभिभूत हो उनसे कहा था कि, ‘महे तो सिर्फ पीर हाँ और थे पीरों का पीर बाबा रामदेव जी  !
  •  जिस विशिष्ट योगदान के लिए रामदेवजी की पूजा होती है वह है ! समाज की सभी जातियों और धर्मों के अनुयायियों के साथ समान व्यवहार !
  •  रामदेव जी ने छुआछूत का पूर्ण रूप से बहिष्कार कर सबको अपनाया !
  •  उनके अनुसार संसार में ऊँच-नीच जैसी कोई चीज नहीं है। उन्होंने हरिजनों को गले के हार के हीरे-मोती व गूंगे बतलाया !
  • बाबा रामदेव जी की चूरमा मिठाई, दूध, नारियल और धूप आदि से पूजा होती है !
  • रामदेवजी की पड़ मुख्यतः जैसलमेर व बीकानेर में बाँची जाती है !
  •  रुणेचा (रामदेवरा) में इनके पुजारी तँवर राजपूत होते हैं बाबा रामदेव की सौगन्ध को इनके भक्त ‘रामदेवजी की आंण’ कहते हैं ! इनके भक्त कभी भी इनकी झूठी सौगन्ध नहीं खाते हैं !
  • रामदेवजी की सोने या चाँदी के पत्तर पर मूर्ति खुदवाकर गले में पहनी जाती है ! इस पतरे को ‘फूल’ कहते हैं !
  •  रामदेवजी गुरु के महत्त्व को स्वीकारते हुए कहते थे कि भवसागर से गुरु ही पार उतार सकता है ! उनका मूर्तिपूजा में कोई विश्वास नहीं था ! वे तीर्थ यात्रा के भी विरोधी थे ! उन्होंने कहा कि गुरु के आदेशों पर चलने से अमरज्योति मिल जाती है ! इस हेतु उन्होंने सर्वश्रेष्ठ मार्ग’अजपाजाप बतलाया !

प्रमुख ग्रंथ ( Baba Ramdev Ji Major Books ) –

  • बाबा रामदेव जी का ब्यावला (पूनमचंद द्वारा रचित), श्री रामदेवजी चरित (ठाकुर रुद्र सिंह तोमर), श्रीरामदेव प्रकाश (पुरोहित रामसिंह), रामसापीर अवतार लीला (ब्राह्मण गौरीदासात्मक) एवं श्रीरामदेवजी री वेलि (हरजी भाटी) आदि इन पर लिखे प्रमुख ग्रंथ है !