महाराणा उदयसिंह (1540 -1572 ई.) – Maharana Udai Singh

महाराणा उदयसिंह द्वितीय
राणा उदयसिंह द्वितीय
महाराणा उदयसिंह

महाराणा उदयसिंह द्वितीय

मेवाड़ के राणा
शासनावधि 1540-1572 (32 साल)
राज्याभिषेक 1540, चित्तौड़गढ़
पूर्ववर्ती बनवीर
उत्तरवर्ती महाराणा प्रताप
जन्म 4 अगस्त 1522
चित्तौड़गढ़ दुर्ग, राजस्थान, भारत
निधन 28 फ़रवरी 1572(1572-02-28) (उम्र 49)
गोगुन्दा ,राजस्थान ,भारत
संगिनी महारानी जयवंता बाई , स्वरूपदे
राजवंश सिसोदिया (राजपूत)
पिता राणा सांगा
माता रानी कर्णावती
धर्म हिन्दू

महाराणा उदयसिंह का जीवन परिचय :-

  • जन्म :- इनका जन्म 14 अगस्त 1522 ईस्वी में चित्तौड़गढ़ दुर्ग में हुआ था।
  • पिता जी का नाम :- महाराणा सांगा
  • माता जी का नाम :- हाडी रानी कर्मावती।
  • धाय मां :- पन्नाधाय।

पन्नाधाय द्वारा महाराणा उदय सिंह के प्राणों की रक्षा :-

सन् 1536 ईं दासी पुत्र बनवीर ने विक्रमादित्य की हत्या कर दी थी, परंतु उसी समय महाराणा उदयसिंह द्वितीय के प्राणों की रक्षा पन्नाधाय अपने पुत्र चंदन की बलि देकर करती है।और उदय सिंह को चित्तौड़गढ़ दुर्ग से कुंभलगढ़ दुर्ग में भेज देती है। इसी प्रकार महाराणा उदय सिंह के प्राण की रक्षा कर लेती हैं। उसी दौरान कुंभलगढ़ में महाराणा उदय सिंह को चितौड़गढ़ का उत्तराधिकारी मानने से मना कर देते हैं।क्योंकि महाराणा उदयसिंह ने पन्नाधाय के पुत्र चंदन की पोशाक पहन रखी थी। उसी समय पाली के अखेराज सोनगरा राणा उदयसिंह के साथ भोजन करके लोगों को यकीन दिलाया कि यही राजकुमार हैं। और सन 1537 में राजा स्वीकार कर लिया जाता है।

महाराणा उदय सिंह का राज्य अभिषेक :-

1537 में कुंभलगढ दूर्ग़ में महाराणा उदय सिंह का राज्याभिषेक हुआ था। इस राज्य अभिषेक में मेवाड़ के राजा महाराजा भी शामिल हुए थे। उसमें से एक मालदेव भी थे। जो जोधपुर के शासक थे।

महाराणा उदयसिंह के द्वारा बनवीर की हत्या :-

महाराणा उदयसिंह द्वितीय के द्वारा सन् 1540 में जोधपुर के शासक मालदेव के सहयोग से मावली (उदयपुर) में बनवीर को मार देते हैं। बनवीर की हत्या के बाद मेवाड़ का चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर महाराणा उदय सिंह ने कब्जा कर लिया था। राणा उदय सिंह को अपना पैतृक गढ़ 1540 में प्राप्त हो जाता है। महाराणा उदय सिंह महादेव के सहयोग से प्रसन्न हो जाते हैं और मालदेव को अपना प्रिय हाथी बसंतराय भेटस्वरूप देते हैं।

राणा उदय सिंह का विवाह :-

महाराणा उदयसिंह का विवाह जवन्ताबाई से होता है। जवन्ताबाई पाली के 13 अखेराज की पुत्री थी। विवाह के बाद 9 मई 1540 में चैत्र शुक्ल को बादल महल में शिरोमणि महाराणा प्रताप का जन्म हुआ था। जवन्ता बाई महाराणा उदय सिंह की पहली महारानी महारानी थी। जवन्ताबाई के अलावा और महाराणा उदय सिंह के 22 रानियाँ थी। महाराणा उदय सिंह के 17 पुत्र और 5 पुत्रियां थी।

शेरशाह सूरी द्वारा चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण :-

शेरशाह सूरी ने सन 1534 ईस्वी को चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर आक्रमण कर देता है, परंतु महाराणा उदयसिंह शेरशाह सूरी को चित्तौड़गढ़ दुर्ग बिना किसी युद्ध के सौप देते हैं। इसके बाद शेरशाह सूरी ने सम्सख्वास्खाँ को चित्तौड़गढ़ दुर्ग का प्रशासक बना देते हैं तथा चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर शासन करने लग जाते हैं। महाराणा उदय सिंह मेवाड़ का प्रथम शासक था जिन्होंने अफगानी शासन की अधीनता स्वीकार की थी। इसके अलावा महाराणा उदयसिंह, छापामार और गोरिल्ला युद्ध की कला में निपुण था। इस कला में महाराणा उदय सिंह मेवाड़ के प्रथम शासक थे। इसी युद्ध कला के कारण महाराणा उदय सिंह ने शेरशाह सूरी की मृत्यु के बाद फिर से चित्तौड़गढ़ दुर्ग पर अधिकार कर लिया था।

महाराणा उदय सिंह द्वारा जयमल राठौड़ को शरण :-

1562 ईस्वी में अकबर ने मेड़ता, नागौर के शासक जयमल राठौड़ पर आक्रमण कर दिया था। तो महाराणा उदय सिंह ने जयमल राठौड़ को अपने दुर्ग में शरण दी थी। इसी कारण से सन 1567 में अकबर ने मांडलगढ़ भीलवाड़ा के रास्ते चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर दिया था। इस कारण से महाराणा उदय सिंह उदयपुर की गोगुंदा की पहाड़ियों में भाग जाता है तथा अकबर ने महाराणा उदय सिंह का पीछा करने के लिए हैसन कुली खां को भेज देते हैं। महाराणा उदयसिंह चित्तौड़गढ़ का शासन जयमल राठौड़ और फतेह सिंह को सौंप देता है।

चित्तौड़गढ़ का तीसरा युद्ध :-

25 फरवरी 1568ईं.में चित्तौड़गढ़ चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण कर देता है। उस समय जयमल राठौड़ चित्तौड़गढ़ दुर्ग की मरम्मत कर रहे होते हैं। अकबर ने अपनी बंदूक (संग्राम) से जयमल राठौड़ के पेर पर गोली मार देते हैं। उसके बाद जयमल राठौड़ बुरी तरह से घायल हो जाता है। घायल अवस्था में उनके भतीजे वीर कल्ला ने अपने कंधों पर उठा लिया था। तब अकबर को जयमल राठौड़ के चार हाथ देखते हैं। इसी कारण से वीर कला को चार हाथो वाला लोक देवता भी कहते हैं। जयमल राठौड़, फतेह सिंह सिसोदिया और वीर कल्ला अकबर की सेना से वीरता पूर्ण तरीके से युद्ध करते हैं।

अकबर ने उनकी वीरता को देखकर आगरा में जयमल राठौड़ और फतेह सिंह की गजारुढ मूर्तियां लगाई थी। बाद में बीकानेर के शासक जयसिंह ने इन मूर्तियों को जूनागढ़ के किले में लगवा दी थी। इसके बाद फूल कंवर व अन्य रानियों ने जोहर कर लिया था तथा जयमल राठौड़, फतेह सिंह सिसोदिया तथा वीर कल्ला ने केसरिया धारण कर लिया था। इसे चित्तौड़गढ़ दुर्ग का तीसरा साका कहा जाता था। इसके बाद वीर कला की रानी कृष्णा कंवर ने वीर कला प्रधान पीठ रेनेला नें (चित्तौड़गढ़ )में जोहर कर लिया था।

महाराणा उदय सिंह द्वारा नई राजधानी का चयन :-

चित्तौड़गढ़ दुर्ग अपने हाथों से निकलने के बाद महाराणा उदय सिंह ने अपनी दूसरी राजधानी गोगुंदा (उदयपुर) को बना लेते हैं। सन्1567ईं. में महाराणा उदय सिंह ने उदयपुर की स्थापना की थी तथा इसको अपनी राजधानी बनाई थी। इसके अलावा महाराणा उदयसिंह ने उदयपुर में उदयपुर झील का निर्माण करवाया था तथा उदयपुर में सिटी पैलेस के अंदर राज महल का निर्माण करवाया था। इस राज महल में महाराणा प्रताप का भाला भी मौजूद है।

महाराणा उदयसिंह की मृत्यु :-

महाराणा उदयसिंह अपनी उम्र के अंतिम पड़ाव में बीमार हो जाते हैं तथा 28 फरवरी 1572 में होली के दिन महाराणा उदयसिंह की मृत्यु हो जाती हैं।