महाराणा कुंभा (Maharana Kumbha)

महाराणा कुंभा का जीवन परिचय :-

महाराणा कुंभा या महाराणा कुम्भकर्ण (मृत्यु 1468 ई.) सन 1433 से 1468 तक मेवाड़ के राजा थे। महाराणा कुंभकर्ण का भारत के राजाओं में बहुत ऊँचा स्थान है।

वीर महाराणा कुंभा
जन्म 1423 ईस्वी
पिता का नाम महाराणा मोकल
माता सौभाग्य देवी
शिक्षा प्राप्त की कलकत्ता विश्वविद्यालय
राज्य अभिषेक 1433 ईस्वी
धर्म , राजवंश हिन्दू , सिसोदिया
संतान ऊदा सिंह, राणा रायमल, रमाबाई (वागीश्वरी)

राज्य अभिषेक :-

कुंभा का राज्य अभिषेक 1433 ईस्वी में हुआ था।

महाराणा कुंभा के मेवाड़ के शासक बनने के बाद उनके कार्य :-

कुंभा ने शासक बनने के बाद अपने यशस्वी पराक्रम के द्वारा न केवल कठिनाइयों का सामना किया था !  इसके अलावा युद्ध कालीन और सांस्कृतिक उपलब्धियों से मेवाड़ के गौरव को ऊंचाइयों तक पहुंचा दिया था !

मेवाड़ का शासक बनने के बाद कुंभा के सामने कठिनाइयां :-

महाराणा क्षेत्रसिंह (1433-82ईं) की पत्नी की संतान वे चाचा और मेरा, पिता मोकल की हत्या कर मेवाड़ पर अधिकार करने के लिए प्रयास कर रहे थे ! उस कारण मेवाड़ी सरदार दो भागों में बंट गए थे ! एक गुट कुंभा समर्थकों का। दूसरा गुट उनके विरोधियों चाचा वह मेरा, के समर्थकों का ! इस अव्यवस्था का लाभ उठाकर अनेक राजपूत शासकों ने अपने स्वतंत्र राज्य स्थापित करने के प्रयास किए थे ! महाराणा कुंभा द्वारा रंगमल व राघव देव के नेतृत्व में भेजी गई सेना ने शीघ्र ही विद्रोहियों को हरा दिया था ! इस युद्ध में चाचा और मेरा, अनेक समर्थकों के साथ मारे गए थे ! किंतु चाचा का पुत्र एक्का व महपा भाग गए थे।इन्होंने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी की शरण ली थी !

मेवाड़ और मालवा का संबंध :-

महाराणा कुंभा

मेवाड़ और मालवा दोनों एक दूसरे के पड़ोसी राज्य थे ! और यहां के शासक अपने-अपने राज्यों की सीमाओं का विस्तार करना चाहते थे ! इस कारण से दोनों राज्यों के बीच संघर्ष होना आवश्यक था ! परंतु दोनों राज्यों के बीच संघर्ष का मुख्य कारण मालवा के सुल्तान द्वारा कुंभा के विद्रोही सरदारों को अपने यहां शरण देना था ! मोकल के हत्यारे ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी के पास शरण ले रखी थी !

महाराणा कुंभा द्वारा महमूद खिलजी को पराजित :-

कुंभा ने सुल्तान को पत्र लिखकर महपा को सौंपने की मांग की थी ! लेकिन सुल्तान ने इस मांग को अस्वीकार कर दिया था ! इस कारण से  कुंभा ने मालवा पर आक्रमण करने का निर्णय लिया था ! इसी कारण से सन 1437 ईस्वी में सांरगपुर नामक स्थान पर दोनों सेनाओं के मध्य बहुत भयंकर युद्ध हुआ था ! इस युद्ध में महमूद की बुरी तरह से हार हुई थी ! तथा महमूद खिलजी भाग गया था ! महाराणा कुंभा ने महमूद खिलजी का पीछा किया था ! पीछा करते हुए कुभा ने मालवा को चारों तरफ से घेर लिया था ! तथा महमूद खिलजी को कैद करके चित्तौड़ ले आए थे ! महाराणा कुंभा ने महमूद खिलजी को 6 महीने तक कैद में रखा था ! इसके बाद बिना किसी शर्त के उसे छोड़ दिया था !

महमूद खिलजी द्वारा कुंभलगढ़ पर आक्रमण :-

खिलजी ने अपनी पहली हार का बदला लेने के लिए सन 1443 ईस्वी में कुंभलगढ़ पर आक्रमण कर दिया था ! महाराणा कुंभा ने इस आक्रमण का मुकाबला किया था ! कुंभा ने किले के दरवाजे के नीचे बाण माता के मंदिर के पास दीप सिंह के नेतृत्व में एक मजबूत सेना को स्थापित कर दिया था ! यह युद्ध 7 दिन तक चला था  इसके बाद दीप सिंह व उनके साथियों की मृत्यु हो जाती है !
इसके बाद इस युद्ध में महमूद खिलजी को बहुत बड़ा नुकसान हुआ था !  खिलजी ने इस नुकसान की पूर्ति मंदिर की टुटी मूर्तियों को कसाईयो को मास तोलने के लिए भेच दी थी ! उसने  नंदी की मूर्ति का चुना पकाकर राजपूतों को पान में खिलाया था !

 खिलजी के चित्तौड़गढ़ तथा मांडलगढ़ पर अधिकार करने के असफल प्रयास :-

महाराणा कुंभा
महाराणा कुंभा

उसने अपनी सेना के नेतृत्व में चित्तौड़ पर अधिकार करने के प्रयास किया था। किंतु उसे सफलता नहीं मिली थी। इसके बाद में उसने एक बार फिर से सन 1446 ईसवी में आक्रमण किया था। इसका मुख्य कारण महमूद खिलजी के द्वारा चित्तौड़ और मांडलगढ़ पर अधिकार करना था। लेकिन महमूद खिलजी का यह प्रयास असफल रहा था।इसके बाद महमूद खिलजी ने सन् 1456 ईसवी में मांडलगढ पर अधिकार करने का प्रयास किया था। परंतु यह प्रयास भी असफल रहा था।

महाराणा कुंभा का मेवाड़ और गुजरात के संबंध :-

कुंभा के शासनकाल में गुजरात की व्यवस्था समाप्त हो चुकी थी। और वहां के शासक अपने प्रभाव से इन क्षेत्रों पर अपना अधिकार करने के लिए प्रयास कर रहे थे। मालवा तथा मेवाड़ के बीच चलने वाले संघर्ष तथा सिरोही तथा गुजरात की राजनीतिक स्थिति ने मेवाड़ गुजरात के बीच संघर्ष को आवश्यक बना दिया था। सन 1456 में फिरोज खा की मृत्यु के बाद उसका पुत्र शम्सखां नागौर का शासक बना था। लेकिन फिरोज खान के छोटे भाई मुजाहिदखां ने शम्सखां को पराजित कर दिया था। तथा नागौर को अपने अधिकार में ले लिया था। शम्सखां ने महाराणा कुंभा की सहायता से मुजाहिद को हराकर नागौर पर फिर से अपना अधिकार कर लिया था। लेकिन शम्सखां ने महाराणा कुंभा की शर्तों के विपरीत नागौर के किले की मरम्मत करवाई थी।

इससे नाराज होकर महाराणा कुंभा ने नागौर पर आक्रमण कर दिया था। तथा नागौर पर अपना अधिकार कर लिया था।इसके बाद इसके कारण शम्सखां ने गुजरात के सुल्तान कुतुबुद्दीन के साथ अपनी लड़की का विवाह करके सहायता की मांग की थी। इसके बाद कुतुबुद्दीन आक्रमण के लिए तैयार हुए थे। इसके बाद सिरोही के देवड़ा शासक की प्रार्थना पर उसने अपने सेनापति मलिक सहवान को आबू विजय के लिए आक्रमण के लिए भेज दिया था। तथा स्वयं कुंभलगढ़ पर आक्रमण करने के लिए चला गया था। कुछ इतिहासकारों जैसे फरिश्ता का मानना है कि महाराणा कुंभा से धन मिलने के बाद सुल्तान गुजरात लौट आया था।

मालवा पर अधिकार करने के लिए सयुक्त आक्रमण :-

उस समय कुतुबुद्दीन के सामने महमूद खिलजी के प्रतिनिधि ताजखां ने मेवाड़ पर गुजरात और मालवा के संयुक्त आक्रमण की योजना बनाई थी। जिसके अनुसार मेवाड़ के दक्षिणी भाग पर गुजरात और मेवाड़ के मुख्य भाग में अहीरवाङा पर मालवा का अधिकार हो गया था। सन 1456 ईसवी में चंपानेर नामक स्थान पर आशय संधि हुई थी। इस संधि के कारण कुतुबुद्दीन ने आबू पर अपना अधिकार कर लिया था। इसके बाद कुतुबुद्दीन ने चित्तौड़ पर अधिकार करने के लिए रवाना हो गया। तथा दूसरी तरफ से महमूद खिलजी ने मालवा की तरफ से मालवा पर आक्रमण कर दिया था। इतिहासकार फरिश्ता के अनुसार महाराणा कुंभा ने आक्रमणकारियों को धन देकर विदा किया था। जबकि कीर्ति स्तंभ प्रशस्ति और रसिकप्रिया के अनुसार  कुंभा ने दोनों आक्रमणकारियों को हरा दिया था। मुगल शासकों पर विजय के कारण महाराणा कुंभा हिंदू सुरयाण (हिंदू बादशाह)के रूप में प्रसिद्ध हुए थे।

महाराणा कुंभा की महत्वपूर्ण उपलब्धियां :-

कुंभा एक वीर योद्धा के साथ-साथ कलाप्रेमी तथा विद्या अनुरागी शासक थे। इस कारण से महाराणा कुंभा को युद्ध में स्थिर बुद्धि भी कहा जाता था। एकलिंग महात्म्य के अनुसार महाराणा कुंभा वेद, स्मृति, मीमासा,उपनिषद, व्याकरण, राजनीति और साहित्य में बड़े निपुण थे। महान संगीत ज्ञाता होने के कारण उन्हें अभिनव भरताचार्य तथा वीणा वादन प्रणीणेन भी कहा जाता था। महाराणा कुंभा को राणी रासो (विद्वानों का संरक्षक) भी कहा जाता है । वो अपने आपको यशस्वी गुप्त सम्राटों के समान परमभागवत काहा करता था। महाराणा कुंभा ने आदिवराह की उपाधि धारण की थी।

इन के दरबार में एकलिंग महात्म्य जैसे लेखक भी रहते थे।

कुंभा की पुत्री महाराणा कुंभा की एक पुत्री थी जिसका नाम रमाबाई था। रमाबाई को वागेश्वरी कहा जाता था। यह अपने संगीत के कारण प्रसिद्ध थी ।

वीर महाराणा कुंभा द्वारा प्रमुख ग्रंथों की रचना :-

महाराणा कुंभा ने संगीत राज, संगीत मीमासा, संगीत कर्म दीपिका व सुड प्रबंध जैसे मुख्य ग्रंथों की रचना की थी।

संगीत राज ग्रंथ पांच भागों में बंटा हुआ है :-

पाठरत्न कोष, गीतरत्न कोष, वाद्यरत्न कोष, नृत्यरत्न कोष, तथा रसरत्न कोष में बंटा हुआ है ।

महाराणा कुंभा द्वारा नाटकों की रचना :-

कुंभा ने मराठी, कन्नड़, तथा मेवाड़ी भाषा में चार प्रमुख नाटकों की रचना की थी। कुंभा ने कीर्ति स्तंभ के विषय में एक ग्रंथ की रचना की थी। और इन को शिलाओ पर खुदवा कर विजय स्तंभ में लगवाया था। इसके अनुसार उसने जय और पराजय के मतों को देकर इस ग्रंथ की रचना की थी। महाराणा कुंभा का कामराज रतिसार नामक ग्रंथ सात भागों में विभक्त हैं। महाराणा कुंभा के शासनकाल में कवि मेहा, एक प्रसिद्ध था।

इनकी प्रमुख रचनाओं में तीर्थ माला प्रसिद्ध है। इसमें 120 तीर्थों का वर्णन किया गया है।। कवि मेहा, वीर महाराणा कुंभा के महत्वपूर्ण निर्माण कार्यों कुंभलगढ़ तथा रणकपुर जैन मंदिर के कार्यों में उपस्थित थे। कुंभा हीरानंद मुन्नी को अपना गुरु मानते थे। महाराणा कुंभा ने इन्हें कविराज की उपाधि दी थी।

महाराणा कुंभा के महत्वपूर्ण कार्य :-

कविराज श्यामल दास की रचना वीर विनोद के अनुसार मेवाड़ में महाराणा कुंभा ने 32 दुर्गों का निर्माण करवाया था। महाराणा कुंभा ने अपने राज्य के पश्चिमी सीमा व तंग रास्तों को सुरक्षित रखने के लिए नाकाबंदी भी की थी। तथा सिरोही के निकट बसंती दूर्ग बनाया था। मेरो, के प्रभाव को रोकने के लिए मचान के दुर्ग का निर्माण करवाया था। तथा केंद्रीय शक्ति को पश्चिम क्षेत्रों में अधिक शक्तिशाली बनाने व सीमांत क्षेत्रों को सैनिक सहायता पहुंचाने के लिए 1452 ईसवी में परमारो के प्राचीन दूर्ग के अवशेषों पर अचलगढ दुर्ग का निर्माण करवाया था। महाराणा कुंभा ने कुंभलगढ़ दूर्ग के चारों तरफ 36 किलोमीटर लंबा परकोटे का निर्माण करवाया था। यह परकोटा चीन की दीवार के बाद दूसरी बड़ी इमारत मानी जाती हैं।रणकपुर पाली के जैन मंदिर महाराणा कुंभा के समय में ही धारणक के द्वारा बनाया गया था।

महाराणा कुंभा द्वारा विजय स्तंभ का निर्माण :-

कुंभा ने चित्तौड़गढ़ दूर्ग के भीतर विजय स्तंभ का निर्माण करवाया था। विजय स्तंभ 9 मंजिला तथा इसकी ऊंचाई 122 फिट है। इसका निर्माण महाराणा कुंभा ने मालवा के सुल्तान महमूद खिलजी पर विजय की स्मृति के रूप में करवाया था। इसका निर्माण मुख्य शिल्पी जैता व उसके तीन पुत्रों नापा,पोमा, पूंजा की देखरेख में हुआ था। इसमें अनेक देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमाएं उत्कृष्ट होने के कारण इसे पौराणिक हिंदू मूर्तिकला का अनमोल खजाना कहा जाता है।

डॉक्टर गॉपी नाथ शर्मा ने विजय स्तंभ को हिंदू देवी देवताओं से सजाया हुआ एक संग्रहालय की संज्ञा दी थी। तथा गौरीशंकर हीरा चंद ओझा ने पौराणिक देवताओं के अमूल्य कोष की संज्ञा दी थी। विजय स्तंभ के मुख्य द्वार पर विष्णु जी की प्रतिमा होने के कारण इसको विष्णु ध्वज भी कहा जाता है। महाराणा स्वरूप सिंह ने 1842-61 ईसवी के काल में इसका पुनर्निर्माण करवाया था । भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान विजय स्तंभ ने क्रांतिकारियों के लिए प्रेरणा के स्रोत के रूप में कार्य किया था।

महाराणा कुंभा कि मृत्यु –

महाराणा कुंभा की मृत्यु 1468 ईस्वी में हुई थी। अपने अंतिम दिनों में उन्माद के रोग से ग्रसित हो गए थे। उन्होने अपना अधिकाश समय कुंभलगढ़ दुर्ग में बिताया था। कुंभलगढ़ दुर्ग में उनके सौतेले पुत्र उदा,ने 1468 ईस्वी में इनकी हत्या कर दी थी।

 

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