मेहरानगढ़ किले की पूरी जानकारी । Mehrangarh Fort

हेलो दोस्तों आज हम राजस्थान के जोधपुर में स्थित मेहरानगढ़ किले के बारे में जानेगे

मेहरानगढ़ किले का इतिहास | Mehrangarh Fort History

Mehrangarh Fort – जोधपुर नगर की उत्तरी पहाड़ी चिड़ियाहूंक पर मेहरानगढ़ किला बना हुआ है ! यह पर्वत दुर्ग की श्रेणी में आता है ! इसे मयूरध्वजगढ़, मोरध्वजगढ़ तथा गढ़चिंतामणी कहा जाता है ! लाल बलुआ पत्थर से निर्मित मेहरानगढ़ किले के महा ‘गढ़ बण्यो मेहराण’ ! मयूराकृति का होने के कारण जोधपुर के किले को मधूरध्वजगढ़ (मोरध्वजगढ़) भी कहते हैं ! इसकी स्थापना मई, 1459 को राव जोधा ने की थी जो मण्डौर के राठौड़ शासकों का वंशज था ! कहा जाता है कि एक तान्त्रिक अनुष्ठान के तहत इस दुर्ग की नींव में भाभी जाति का राजिया नामक एक व्यक्ति जीवित ही चुना गया था ! जिस स्थान पर राजिया को गाढ़ा गया था उसके ऊपर नक्कार खाना तथा खजाने की इमारतें बनवायी गयी !

  • मेहरानगढ़ किले का परिचय 
  • किले का निर्माण – राव जोधा ने इसका निर्माण करवाया 
  • निर्माण कब हुआ – 12 मई 1459 ई. को 
  • स्थान – जोधपुर 
  • राज्य – राजस्थान ( भारत )

किले की तलहटी में बसे जोधपुर नगर के चारों ओर एक सुदृढ़ प्राचीर (शहरपनाह) बनी है जिसमें 101 विशाल बुर्जे और 6 दरवाजे हैं ! ये दरवाजे नागौरी दरवाजा, मेड़तिया दरवाजा, सोजती दरवाजा, सिवानची (सिवाणा) दरवाजा, जालौरी दरवाजा तथा चाँदपोल कहलाते हैं ! इनमें पश्चिमी दरवाजे चाँदपोल को छोड़कर अन्य पाँच दरवाजों के नाम मारवाड़ के उन प्रमुख नगरों के नाम पर हैं ! जिनके मार्ग उधर होकर जाते हैं !

मेहरानगढ़ किले की बनावट और प्रवेश द्वार

मेहरानगढ़ किले की बनावट लाल बलुआ पत्थर से निर्मित है  इस दुर्ग के चारों और 20 से 150 फुट ऊंची दीवारें बनी हुई ! और यह दीवारें 12 से 20 फुट तक चौड़ी है ! इस मेहरानगढ़ किले के दो बाह्य प्रवेश द्वार हैं – उत्तर पूर्व में जयपोल तथा दक्षिण पश्चिम में शहर के अंदर से फतेहपोल ! इनमें जयपोल का निर्माण जोधपुर के महाराजा मानसिंह ने 1808 ई. के आसपास करवाया था ! इसमें लगे लोहे के विशाल किंवाड़ों को यहां के महाराजा अभयसिंह की सरबलन्दखां के विरुद्ध ! मुहिम में निमाज के ऊदावत ठाकुर अमरसिंह अहमदाबाद से लूटकर लाये थे ! फतेहपोल का निर्माण महाराजा अजीतसिंह द्वारा जोधपुर पर से मुगल खालसा (आधिपत्य) समाप्त करने के उपलक्ष्य में करवाया गया था !

  • जोधपुर दुर्ग का एक अन्य प्रमुख प्रवेश द्वार लोहापोल है !

लोहापोल के साथ दो अतुल पराक्रमी क्षत्रिय योद्धाओं धन्ना और भीवा (जो आपस में मामा भानजा थे) के पराक्रम और बलिदान की यशोगाथा जुड़ी है ! जिन्होंने अपने स्वामी पाली के ठाकुर मुकुन्दसिंह (महाराजा अजीतसिंह के सामंत) की एक आंतरिक विग्रह में मृत्यु का प्रतिशोध लेते हुए ! अपने प्राणों की बाजी लगा दी थी !

मेहरानगढ़ किले के अन्य प्रवेश द्वारों में ध्रुवपोल, सूरजपोल, इमरतपोल तथा भैरोंपोल प्रमुख और उल्लेखनीय हैं ! प्रारम्भ में जोधपुर के किले का विस्तार उस स्थान तक ही था जो ‘जोधाजी का फलसा’ कहलाता है ! बाद में परवर्ती शासकों द्वारा इसमें समय-समय पर परिवृद्धि होती रही है ! विशेषकर जयपोल से डेढ़ कांगरापोल (लखनापोल) तक किले की प्राचीर बाद में बनी !

  • किले के अंदर महल

मेहरानगढ़ किले के भीतर महाराजा सूरसिंह के बनवाये हुए मोती महल, अजीतसिंह के बनवाये हुए है !फतह महल, अभयसिंह के बनवाये हुए फूल महल, बखतसिंह के बनवाये हुए सिंगार महल दर्शनीय हैं ! महाराजा मानसिंह द्वारा स्थापित ‘पुस्तक प्रकाश’ नामक पुस्तकालय आज भी कार्यरत है !

मेहरानगढ़ किले के अन्य प्रमुख भवनों में ख्वाबगाह का महल, तखत विलास, दौलतखाना, चोखेलाव महल, बिचला महल, रनिवास, सिलहखाना, तोपखाना उल्लेखनीय हैं ! दौलतखाने के आंगन में महाराजा तखतसिंह द्वारा विनिर्मित सिणगार चौकी (शृंगार चौकी) है ! जहां जोधपुर के राजाओं का राजतिलक होता था !

  • मेहरानगढ़ किले की तोपें

मेहरानगढ़ किले में लम्बी दूरी तक मार करने वाली अनेक प्राचीन तोपें स्थित है ! जिनमें किलकिला तोप  , शंभुबाण तोप  , गजनीखान तोप  ,
जमजमा तोप  , कड़क बिजली तोप  , बगस वाहन तोप  , बिच्छू बाण तोप  , नुसरत तोप  , गुब्बार, धूड़धाणीद तोप , नागपली तोप , मागवा तोप , व्याधी तोप , मीरक तोप और  चंग, मीर बख्श, रहस्य कला तथा गजक नामक तोपें अधिक प्रसिद्ध हैं !
दुर्ग की प्राचीर पर ब्रिटिश काल की तोपों का संग्रह एकत्रित किया गया है था ! इस दुर्ग में  गुब्बार तोप भी दौलत खाने में रखी हुई है जो दर्शनीय  मानी जाती है  किलकिला तोप सूबेदार राजा अजीतसिंह के समय मै निर्मित करवाई गई थी !   यह तोप अजीतसिंह ने (ई. 1715 में) विजयराज भण्डारी के माध्य से अहमदाबाद से 1400 रूपये में क्रय करवाई थी !

‘शंभू बाण’ तोप राजा अभयसिंह ने अहमदाबाद के सूबेदार सरबुलन्द खां को (ई. 1730 में) परास्त कर प्राप्त की थी ! यहां भी कहा जाता है कि यह तोप अभयसिंह ने सूरत से खरीद कर जोधपुर मंगवाई ! कड़क-बिजली नामक तोप राजा अतीजसित के समय घोणेराव से मंगवाई गई थी ! नुसरत तोप राजा अभयसिंह ने सन 1730 ई. में अहमदाबाद शहर के गवर्नर सर बुलन्द सरकार खां ! और गजनी खां को परास्त कर छीनी थी ! 1607 ई. में राजा गजसिंह ने जालोर पर चढ़ाई कर गजनी खान नामक तोप प्राप्त की थी ! जिनमें किलकिला, शंभुबाण, गजनीखान आदि प्रसिद्ध तोपें हैं !

  • मेहरानगढ़ किले के मंदिर

मेहरानगढ़ किले के परिसर में स्थित मंदिरों में चामुण्डा माता, मुरली मनोहर और आनंदघन के प्राचीन मंदिर हैं ! महाराजा मानसिंह के ही समय वीर कीरतसिंह सोढ़ा जोधपुर के किले पर शत्रुओं से संघर्ष करते हुए काम आया ! जिसकी छतरी जयपोल के निकट बाई और विद्यमान है ! दुर्ग के भीतर राठौड़ों की कुलदेवी नागणेची जी का मंदिर भी विद्यमान है !

  • जोधपुर दुर्ग में जल आपूर्ति

मेहरानगढ़ किले जोधपुर में जल आपूर्ति के प्रमुख स्रोत के रूप में राणीसर और पदमसर तालाब विशेष उल्लेखनीय हैं ! इनमें राणीसर जलाशय का निर्माण राव जोधा की रानी जसमा हाड़ी द्वारा किले की स्थापना के साथ ही करवाया गया था ! पदमसर राव गांगा की रानी पद्मावती द्वारा बनवाया गया !

मेहरानगढ़ किले के प्रमुख आक्रमण

मेहरानगढ़ किले को राव जोधा के बड़े पुत्र राव बीका ने जीतकर अपने अधिकार में कर लिया था ! किंतु राजमाता के कहने पर बीका ने जोधपुर नरेश के समस्त राजकीय चिह्न एवं कुल देवी की मूर्ति लेकर जोधपुर पर से अपना दावा छोड़ दिया ! और बीकानेर में जाकर राज्य करने लगा ! महाराजा मानसिंह ने किले की चाबियां अंग्रेजी कप्तान को सौंप कर दुर्ग में रक्तपात होने से बचाया ! यह दुर्ग वीर दुर्गादास की स्वामिभक्ति का साक्षी है !

सन 1808 ई जोधपुर के जाने माने प्रधान पोकरण ठाकुर सवाई सिंह चंपावत के कहने से जोधपुर रियासत के महाराजा मानसिंह से यूध करने के लिए  जयपुर के महाराजा जगत सिंह ने चढ़ाई कर दी थी ! लेकिन महाराजा मानसिंह ने अपने पराक्रम से इस यूध को जित लिया !

  • अगर आप कभी जोधपुर जाते है तो मेहरानगढ़ किले को जरुर देखे !

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