राजस्थान के लोक देवता

लोक देवता :-


तेरहवीं सदी से राजस्थान में इस्लाम के प्रवेश एवं तुर्क आक्रमणों के कारण राजस्थान के जन-जीवन में एक नवीन परिवर्तन दृष्टिगोचर होता है। इस्लामी संस्कृति के प्रभावों तथा रूढ़िवाद और बाह्याडम्बर से उत्पन्न वातावरण में प्रबुद्ध मनीषियों की चिंतन-धारा मंदिरों और मूर्तियों की अपेक्षा ध्यान, मनन एवं नाम-स्मरण की दिशा की ओर प्रवाहित होने लगी। इसी कालखंड में राजस्थान में कुछ ऐसे महान व्यक्तियों ने जन्म लिया, जिन्होंने अपने आचरण व दृढ़ता से समाज को एक नई राह दिखाई । आमजन ने इनकी दिखाई राह का न केवल अनुसरण किया, वरन इन्हें देवता तुल्य मानते हुए, इन्हें लोक देवता व लोक संत का दर्जा प्रदान किया। इस पोस्ट में हम ऐसे ही कुछ महान व्यक्तित्वों का अध्ययन करेंगे।

अनुक्रम :-


गोगाजी का इतिहास :-


लोक देवता गोगाजी

गोगाजी का नाम राजस्थान के पांच पीरों में बड़ी श्रद्धा से लिया जाता है।

पाबू, हरभू, रामदे, मांगलिया, मेहा।
पांचू पीर पधारज्यो, गोगाजी जेहा।।

  • गोगाजी के पिता का नाम :- जेवर जी ।
  • माता का नाम :- बाछल ।
  • गोगाजी के मौसेरे भाइयों का नाम अरजन-सुर्जन था ।

गोगाजी को गोरखनाथ व महमूद गजनवी के समकालीन माना जाता है। गोगाजी का अपने मौसेरे भाइयों अरजन-सुर्जन के साथ सम्पत्ति का विवाद चल रहा था, और अरजन-सुर्जन द्वारा मुसलमानों की फौज लाकर गोगाजी की गायों को घेर लेने के कारण इनका गोगाजी के साथ भीषण युद्ध हुआ। इसमें अरजन-सुर्जन के साथ गोगाजी भी वीरगति को प्राप्त हुए हो गये थे !

इनका जन्म स्थल ददेरवा शीर्ष मेड़ी तथा इनका समाधि स्थल ‘धुरमेड़ी’ कहलाता है। गोगाजी की स्मृति में गोगामेडी (हनुमानगढ़) एवं समस्त राजस्थान में भाद्रपद कृष्ण नवमी गोगानवमी के रूप में मनायी जाती है। इस दिन गोगाजी की अश्वारोही भाला लिये योद्धा के प्रतीक रूप में अथवा सर्प के प्रतीक रूप में पूजा की जाती है। गोगाजी का पत्थर पर उत्कीर्ण सर्प मूर्तियुक्त पूजा स्थल प्रायः गाँवों में खेजड़ी के वृक्ष के नीचे होता है। मान्यता प्राप्त है, कि गोगाजी को ‘जाहिर पीर’ कहकर पूजने से सर्प-दश का विष प्रभावहीन हो जाता है। इनकी पूजा हिन्दू और मुस्लिम दोनों समुदायों के लोग करते हे, हिंदू ‘नागराज’ तो मुस्लिम ‘गोगापीर’ के रूप में गोगाजी की पूजा करते हैं।

वीर तेजाजी का इतिहास :-


 

तेजाजी

  • वीर तेजाजी का जन्म :- खड़नाल (नागौर) ग्राम में हुआ था ।
  • पिता का नाम :- ताहड़जी ।
  • माता का नाम :- रामकुंवरी ।

वीर तेजाजी का जन्म माघ शुक्ल चतुर्दशी को 1073 ई. में हुआ था। जब तेजाजी अपनी पत्नी पेमल को लेने अपने ससुराल पनेर गये हुए थे, तब उसी दिन को मेर लोग लाछा गुजरी की गायें चुरा कर ले गये थे। गूजरी की प्रार्थना पर तेजाजी गायों को मुक्त कराने जा रहे थे, की रास्ते में इन्हें सुरसुरा (नागौर) नामक स्थान पर एक सर्प मिला। तेजाजी ने सर्प को डसने से रोकते हुए वचन दिया था, कि वे गायों को मुक्त कराने के बाद स्वयं यहाँ आयेंगे।

भीषण संघर्ष के बाद तेजाजी ने गायों को मुक्त कराने में सफलता प्राप्त की। लेकिन अत्यधिक घायल होने पर भी वे अपने वचन के अनुसार वापस सर्प के पास आये। पूरे शरीर पर घाव होने के कारण वीर तेजाजी ने सर्प के डसने के लिए अपनी जिहवा बागे कर दी। सर्प-दंश के कारण सुरसुरा (किशनगढ़) में भाद्रपद शुक्ल दशमी को इनकी मृत्यु हो गई। तेजा दशमी (भाद्रपद शुक्ल दशमी) के अवसर पर पंचमी से पूर्णिमा तक परबतसर (नागौर) में विशाल पशु-मेला लगाकर मनाई जाती है।

तेजाजी भी गोगाजी की ही तरह नागों के लोक देवता के रूप में पूजनीय है। तेजाजी को तलवार धारण किये घोड़े पर सवार योद्धा के रूप में दर्शाया जाता है, जिनकी जिह्वा को सर्प डस रहा है। मान्यता प्राप्त है कि यदि सर्प-दशित व्यक्ति के दायें पैर में तेजाजी की तांत (डोरी) बांध दी जाये तो उसे विष नहीं चढ़ता। लोक देवताओं से संबंधित यह मान्यताएं व कथाएं अक्षरशः सत्य हों आवश्यक नहीं है, इनका मूल उद्देश्य इन कथाओं से जुड़ी शिक्षाओं, यथा-निर्बल की रक्षा, वचन का पालन आदि आमजन तक पहुंचाना रहा है।

पाबूजी महाराज का इतिहास :-


लोक देवता पाबूजी राठौड़ फोटो

  • पाबूजी का जन्म :- 1239 ई. में कोलू में हुआ था।
  • पिता का नाम :- धांधलजी राठौड़ ।

इतिहासकार मुहणोत नैणसी, महाकवि मोडजी आशिया तथा लोगों में प्रचलित मान्यता के अनुसार पाबूजी का जन्म वर्तमान बाड़मेर से आठ कोस आगे खारी खाबड़ के जूना नामक ग्राम में अप्सरा के गर्भ से हुआ। पाबूजी का विवाह अमरकोट के सूरजमल सोढ़ा की पुत्री सोढ़ी के साथ हुआ था। विवाह के मध्य ही उनके प्रतिद्वंद्वी बहनोई जायल (नागौर) नरेश जींदराव खींची ने पूर्व वैर के कारण देवल चारणी की गायों को घेर लिया था। देवल ने पाबूजी से गायों को छुड़ाने की प्रार्थना की थी, तीन फेरे लेने के पश्चात् चौथे फेरे से पूर्व ही वे देवल चारणी की केसर कालमी घोड़ी पर सवार होकर गायों की रक्षार्थ रवाना हो गये थे। कड़े संघर्ष में 1276ई में पाबूजी अनेक साथियों सहित वीर-गति को प्राप्त हुए।

वीरता, प्रतिज्ञापालन, त्याग, शरणागत वत्सलता एवं गौ-रक्षा हेतु बलिदान होने के कारण जनमानस इन्हें लोक देवता के रूप में पूजते है। पाबूजी का मुख पूजा स्थल कोलू (फलौदी) में है, जहाँ प्रतिवर्ष इनकी स्मृति में मेला लगता है। इनका प्रतीक चिहन हाथ में भाला लिए अश्वारोही के रूप में प्रचलित है। पाबूजी को ऊँटों के देवता के रूप में पूजते है। मारवाड़ में सर्वप्रथम ऊँट लाने का श्रेय पाबूजी को है। ऊँटों के स्वस्थ होने पर भोपे-भोपियों द्वारा ‘पाबूजी की फड़’ गाई जाती है। ग्रामीण जनमानस इन्हें लक्ष्मणजी का अवतार मानता है।

देवनारायण जी का जीवन परिचय :-


लोक देवता देवनारायणजी

जन्म :- 1243 ई. के लगभग।

देवनारायणजी बगड़ावत प्रमुख भोजा और सेदू गुर्जर के पुत्र थे, देवनारायणजी के पिता इनके जन्म के पूर्व ही भिनाय नमक स्थान के शासक से संघर्ष में अपने तेइस भाइयों सहित मारे गए थे। भिनाय शासक से इनकी रक्षा हेतु इनकी माँ सेदू इन्हें लेकर अपने पीहर मालवा चली गई। दस वर्ष की अल्पायु में वे पिता की मृत्यु का बदला लेने राजस्थान की ओर लौट रहे थे, तो मार्ग में धारा नगरी में जयसिंह देव परमार की पुत्री पीपलदे से उन्होंने विवाह किया। कुछ समय बाद वे बदला लेने हेतु भिनाय पहुँचे। जहाँ गायों को लेकर भिनाय ठाकुर से हुए संघर्ष में देवजी ने ठाकुर को मौत के घाट उतार दिया।

देवनारायण जी का मुख्य पूजा स्थल आसींद (भीलवाड़ा) में है। तथा यहाँ भाद्रपद शुक्ल सप्तमी को मेला लगता है। इनके मुख्य अनुयायी गूर्जर हैं, जो ‘देवजी की फड़’ तथा देवजी और बगड़ावतों से संबद्ध काव्य ‘बगड़ावत’ के गायन द्वारा इनका यशोगान करते हैं। किंवदंती है कि हर रात तीन पहर गाये जाने पर यह छ: माह में पूर्ण होता है।

राजस्थान के लोक देवता मल्लीनाथजी :-


लोक देवता मल्लीनाथजी

 

  • जन्म :- 1358 ई. (मारवाड़) ।
  • पत्नी :- रानी रूपांदे ।
  • माता पिता का नाम :- रावल सलखा और जाणीदे ।

मल्लीनाथजी का जन्म मारवाड़ के रावल सलखा और जाणीदे के ज्येष्ठ पुत्र के रूप में 1358 ई. में हुआ। पिता की मृत्यु के पश्चात् वे चाचा कान्हड़दे के यहाँ महेवा में शासन प्रबंध देखने लगे। चाचा कान्हड़देव की मृत्यु के बाद वे 1374 ई. में महेवा के स्वामी बन गए। राज्य विस्तार के क्रम में 1378 ई. में फिरोज तुगलक के मालवा के सूबेदार निजामुद्दीन की सेना को मल्लीनाथजी ने मार भगाया। अपनी रानी रूपांदे की प्रेरणा से वे 1389 ई. में उगमसी भाटी के शिष्य बन गये और योग-साधना की दीक्षा प्राप्त की थी। किंवदन्तियों के अनुसार वे भविष्यद्रष्टा एवं देवताओं की तरह चमत्कार-प्राप्त सिद्ध पुरुष बन गए थे।

मल्लीनाथजी ने मारवाड़ के सारे संतों को एकत्र करके 1399 ई. में एक वृहत् हरि-कीर्तन आयोजित करवाया। इसी वर्ष चैत्र शुक्ल द्वितीया को इनका स्वर्गवास हो गया। लूनी नदी के तटवर्ती तिलवाड़ा (बाड़मेर) गाँव में इनका मंदिर है। जहाँ प्रतिवर्ष चैत्र कृष्ण एकादशी से चैत्र शुक्ल एकादशी तक विराट पशु-मेला लगता है। जोधपुर के पश्चिमी परगने का नामकरण इन्हीं के नाम पर ‘मालानी’ किया गया था। मल्लीनाथजी की आज भी मालानी (बाड़मेर) में अत्यधिक मान्यता है।

लोक देवता रामदेव जी :-


लोक देवता रामदेवजी

  • जन्म :- बाड़मेर जिले की शिवं तहसील (ऊँडूकासमेर गाँव) ।
  • पिता का नाम :- अजमालजी ।
  • माता का नाम :- मैणादे ।
  • पत्नी :- नेतलदे ।

तंवर वंशीय अजमालजी और मैणादे के पुत्र रामदेवजी का जन्म बाड़मेर जिले की शिवं तहसील के ऊँडूकासमेर गाँव में हुआ। इन्हें मल्लीनाथजी के समकालीन माना जाता है। बालपन में ही इन्होंने पोकरण क्षेत्र मल्लीनाथजी से प्राप्त करने के पश्चात् वहाँ भैरव नामक क्रूर व्यक्ति का अंत करके अराजकता एवं आतंक खत्म किया। इनका विवाह अमरकोट के दलजी सोढ़ा की पुत्री नेतलदे से हुआ था। अपनी भतीजी को पोकरण दहेज में दे देने के बाद इन्होंने ‘रामदेवरा’ (रुणेचा) गाँव बसाया और वहीं 1458 ई. में भाद्रपद शुक्ल एकादशी को जीवित समाधि ले ली। यहाँ भाद्रपद शुक्ल द्वितीया को विशाल मेला लगता है। सांप्रदायिक सद्भाव इस मेले की मुख्य विशेषता है।

हिन्दू जहाँ श्रीकृष्ण के अवतार के रूप में इनकी आराधना करते हैं, वही गुसलमान ‘रामसा-पीर’ के रूप में देवजी को पूजते हैं। सामान्यतः गाँवों में किसी वृक्ष के नीचे ऊँचे चबूतरे पर रामदेवजी के प्रतीक चिहन ‘पगलिये’ स्थापित किये जाते है। ये स्थान ‘थान’ कहलाते हैं।
रामदेवजी द्वारा कामड़िया पंथ की स्थापना की गई। इस पथ के अनुयायियों द्वारा रामदेवजी के मेले में तेरहताली नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। रामदेवजी वीर होने के साथ-साथ समाज सुधारक भी थे। इन्होंने जाति प्रथा, मूर्तिपूजा और तीर्थयात्रा का विरोध किया। इनको लोक देवता के रूप में पूजते हे।

मेहाजी मांगळिया का जीवन परिचय :-


लोक देवता मेहाजी मांगळिया

मेहाजी मांगळिया राजस्थान के पंचपीरों में गिने जाते हैं। ये राव चूण्डा के समकालीन थे। इनका जन्म पंवार क्षत्रिय परिवार में हुआ था किंतु पालन-पोषण अपने ननिहाल में मांगळिया गोत्र में हुआ था। इसलिए ये मेहाजी मांगळिया के नाम से प्रसिद्ध हुए। इनके स्वाभिमानी स्वभाव के कारण इनके अनेक शत्रु हो गये। अंत में जैसलमेर के राव राणगदेव भाटी से युद्ध करते हुए वे वीरगति को प्राप्त हुए। वे अच्छे शकुन शास्त्री थे। लोगों की सेवा, सहायता करने एवं उन्हें संरक्षण देने के कारण वे लोक देवता के रूप में पूजे गये। बापणी में इनका मन्दिर है, जहाँ भाद्रपद कृष्णा अष्टमी को मेला भरता है।

राजस्थान के लोक देवता हरभूजी :-


हरभूजी भंडेल (नागौर) के महाराज सांखला के पुत्र और राव जोधा (1438-89 ई.) के समकालीन थे। अपने पिता की मृत्यु के पश्चात् वे भूडेल छोड़कर हरभमजाल में आकर रहने लगे। यहाँ रामदेवजी की प्रेरणा से इन्होंने अस्त्र-शस्त्र त्यागकर उनके गुरु बालीनाथजी से दीक्षा ले ली। लोक-मान्यता है कि राव जोधा को मेवाड़ के अधिकार से मण्डोर को मुक्त कराने के प्रयासों के दौरान इन्होंने आशीष के साथ एक कटार भी दी थी। इस सहायता व आशीर्वाद से जब यह भूभाग जोधा के अधीन आ गया तो जोधा ने इन्हें ‘बेंगटी’ गाँव प्रदान किया। हरभूजी को बहुत बड़ा शकुन शास्त्री, वचनसिद्ध और चमत्कारी महापुरुष माना जाता था। इनका प्रमुख स्थान बेंगटी (फलौदी) में है। मनौती पूर्ण होने पर श्रद्धालु यहाँ इनके मंदिर में संस्थापित हरभूजी की गाडी की पूजा अर्चना करते हैं।

क्या आप जानते हैं?
अकबर के चित्तौड़दुर्ग पर आक्रमण के समय अपूर्व वीरता व साहस दिखाने वाले कल्लाजी की
मेवाड़ अंचल में चार हाथों वाले लोक देवता के रूप में प्रसिद्धि है। मान्यता है कि सिर कटने के बाद भी
कल्लाजी का धड़ मुगलों से लड़ता हुआ रूण्डेला तक जा पहुंचा।

बहुचयनात्मक प्रश्न


1. निम्नलिखित में से कौन पंच पीरों में शामिल नहीं है-

(अ) पाबूजी
(ब) गोगाजी
(स) रामदेवजी
(द) तेजाजी
2. तेजाजी का जन्म किस जिले में हुआ था?
(अ) नागौर
(ब) अजमेर
(स) पाली
(द) जोधपुर

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